Friday, December 25, 2015

Vyang -- गंगा और बीजेपी में क्या क्या समान है।

                       ये बहुत पते का सवाल है। पहली बात ये है और यहीं से शुरू भी होती है की जो भी गंगा के भक्त हैं वो ये मानते हैं की कोई कितना ही पापी क्यों ना हो, गंगा स्नान करने से उसके सारे पाप धुल जाते हैं। पाप की क़्वालिटी भले ही कैसी भी हो , आदमी चाहे खूनी हो, बलात्कारी हो, चोर हो या डकैत हो , इस बात से कोई फर्क नही पड़ता। गंगा माँ सबके पाप धो देती है और आदमी को फिर से पाप करने लायक कर देती है।
                         उसी तरह बीजेपी के भी जो भक्त हैं वो ये मान कर चलते हैं की कोई किसी भी पार्टी का कितना ही बड़ा घोटालेबाज हो, देशद्रोही हो, विदेशों में कालाधन जमा कराने वाला हो, या कितना ही बड़ा टैक्स चोर हो, अगर वह बीजेपी में शामिल हो जाता है तो तुरंत शुद्ध हो जाता है। उसके सारे कुकर्म सतकर्मो में बदल जाते हैं। और वो जब तक बीजेपी में रहता है तब तक उसे पाप छू भी नही सकता।
                         जिस तरह गंगा पाप-विमोचिनी है उसी तरह बीजेपी घोटाले-विमोचिनी है।
                         इससे एक तकनीकी स्थिति भी पैदा होती है। आदमी जब तक गंगा में खड़ा रहता है तब तक तो उसमे पाप लगने की कोई संभावना ही नही होती है। उसी तरह जब तक आदमी बीजेपी का सदस्य रहता है उस पर कोई आरोप लग ही नही सकता है। इसी तकनीकी पहलू को विपक्ष समझ नही पा रहा है और आये दिन किसी बीजेपी नेता के खिलाफ कोई आरोप लगा देता है। बेचारे बीजेपी के प्रवक्ताओं को बार-बार टीवी चैनलों पर आकर ये बात समझानी पड़ती है की भाई चूँकि वो बीजेपी का सदस्य है इसलिए उसकी जाँच नही हो सकती। लेकिन फिर कोई नेता आकर नया आरोप लगा देता है। हद तो तब हो गयी जब बीजेपी  कीर्ति आजाद ने अरुण जेटली पर भृष्टाचार का आरोप लगा दिया। अब बीजेपी ने उसे निलंबित करके ये याद दिलाया है की उसे बीजेपी और दूसरी पार्टियों में फर्क करना चाहिए। क्या कीर्ति आजाद भूल गए की बीजेपी "पार्टी विद ड डिफरेंस " है। जब तक आदमी बीजेपी में है उस को कोई आरोप छू भी नही सकता। बिलकुल गंगा माँ की तरह।
                        लेकिन एक बात बीजेपी को समझ नही आ रही। गंगा का पानी भी इतना गन्दा हो चूका है की वो पीने के लायक तो क्या, नहाने के लायक भी नही बचा है। धीरे धीरे लोग बीजेपी के बारे में भी यही मानने लगे हैं। अब गंगा का पानी इतना खराब कैसे हो गया की उसकी सफाई के लिए अलग से कार्यक्रम बनाने की जरूरत पड़ गयी। लेकिन गंगा सफाई के अभियान के बारे में मुरली मनोहर जोशी ने कहा था की इस तरह तो गंगा पचास साल में भी साफ नही हो सकती। अब मुरली मनोहर जोशी यही बात बीजेपी के बारे में कह रहे हैं और आडवाणी और यशवंत सिन्हा उनकी हाँ में हाँ मिला रहे हैं।
                         मैंने मेरे पड़ोसी से इस पर बातचीत करके गंगा के और बीजेपी के प्रदूषित होने के कारण जानने की कोशिश की। उसने कहा की गंगा के गंदे होने का एक कारण उसके ही भक्तों द्वारा उसमे डाले जाने वाले फूल और पूजा सामग्री है। इससे एक तो ये बात भी पता चलती है की ज्यादा भक्ति और पूजा सामग्री भी प्रदूषण का कारण होती है। अब बीजेपी में भी इस तरह की भक्ति बढ़ रही है और उसको प्रदूषित कर रही है। दूसरा बड़ा कारण जो गंगा को प्रदूषित कर रहा है वो है उद्योगों का कचरा बड़ी मात्रा में उसमे गिर रहा है। उसी तरह बीजेपी में उद्योगपतियों का कचरा गिर रहा है। जब तक इसको नही रोका जायेगा तब तक इनकी सफाई नही हो सकती। अपनी बात को जारी रखते हुए मेरे पड़ोसी ने कहा की गंगा में लोग बहुत सी लाश बहा देते हैं। पता नही कितनी लाशें गंगा में तैरती रहती हैं। उसी तरह बीजेपी में भी पता नही कितने सिद्धांतों की लाशें तैर रही हैं।
                        उसके बाद वो राजकपूर की तरह भावुक हो गए और बोले। गंगा पापियों के पाप धोते धोते गंदी हो गयी है। जो पाप लोगों के शरीर से उतरते हैं आखिर वो गंगा के पानी में ही तो जमा होते हैं। उसी तरह बीजेपी ने अपने घोटालेबाजों के जो घोटाले धोये हैं उससे बीजेपी भी गंदी हो गयी है।
                         उनकी आँखे नम हो आई। उन्होंने कहा की गंगा की तरह बीजेपी के लिए भी एक सफाई अभियान की जरूरत है। उसके बाद वो उठकर धीरे धीरे बाहर चले गए।

Thursday, December 24, 2015

Vyang -- हाँ, कीर्ति आजाद के खिलाफ कार्यवाही जरूरी थी।

                जैसे ही कीर्ति आजाद को सस्पेंड करने की खबर आई, मेरे पड़ोसी मेरे यहां आ धमके। उनका लहजा और चेहरा ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कीर्ति आजाद को मैंने सस्पेंड किया हो। मैंने मौके  नजाकत को समझते हुए उन्हें सोफे पर बैठाया और खुद लाकर पानी पिलाया। उसके बाद उनके लिए चाय बनाने को आवाज लगाई और फिर सहमते हुए उनसे इस आवेश का कारण पूछा। वो फट पड़े। अब कीर्ति आजाद को सस्पेंड करने की क्या जरूरत थी ? उसने क्या किया है ?
                मैंने उसके सस्पेंसन की जिम्मेदारी लेने से बचते हुए कहा की अमित शाह ने कहा है की वो पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल थे।
                वो भृष्टाचार के खिलाफ बोल रहे थे। क्या भृष्टाचार पार्टी है ? पड़ोसी ने सोफे से उठने की कोशिश की।
                मैंने उन्हें वापिस बिठाते हुए कहा -- लेकिन अरुण जेटली का नाम आ रहा था।
                क्या अरुण जेटली पार्टी है ? पड़ोसी ने फिर उठने की कोशिश की।
                लेकिन पार्टी के नेता तो हैं।  मैंने उन्हें फिर बिठाया।
               नेता तो कीर्ति आजाद भी हैं।  इस बार उसने बैठे बैठे कहा।
                 लेकिन विपक्षी पार्टियां उनके बयानों का फायदा उठा रही थी। मैंने पास में बैठते हुए कहा।
                विपक्ष तो शत्रुघन सिन्हा के बयानों का भी फायदा उठाता है ?
                उनको भी निकालेंगे।  मैंने कहा।
               और आडवाणी जी ? पड़ोसी ने व्यंग से मुस्कुराते हुए कहा।
                वो तो निकाले जैसे ही हैं।  मैंने सफाई दी।
ओह। तो ये बात है। वैसे तुम ये बताओ की कीर्ति आजाद को धमका कर तुम क्या हासिल करना चाहते हो ? मेरे पड़ोसी मुझसे ऐसे सवाल कर रहे थे जैसे मैं अमित शाह हों।
                देखिये कोईआदमी आज दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन को लेकर अरुण जेटली पर आरोप लगा रहा है, कल वो गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन को लेकर नरेंद्र मोदी या अमित शाह पर आरोप लगाएगा। फिर हिमाचल में अनुराग ठाकुर ने जो क्रिकेट स्टेडियम की जमीन पर होटल बनाया है उसको दुबारा उठाएगा। इस तरह तो पार्टी चल ली। इसलिए पार्टी के हित में इस पर कार्यवाही जरूरी थी। मैंने अपनी तरफ से जवाब देने की पूरी कोशिश की।
                 ये क्रिकेट एसोसिएशन कब से पार्टी हो गयी ? और तुम तो भृष्टाचार से लड़ने की बात करते थे ?
                 भृष्टाचार से तो अब भी लड़ ही रहे हैं। सीबीआई को सख्त आदेश हैं की किसी भी विपक्षी नेता के खिलाफ कुछ भी मिलता है तो खोद कर निकालो। लेकिन अपने लोगों के खिलाफ क्यों लड़ रहे हो।
                अब तो तुम्हारे मार्गदर्शक मंडल ने भी कह दिया है की घोटालों की आवाज उठाने वालों की बजाए उनके उठाये मामलों की जाँच कराओ। --पड़ोसी ने कहा।
                 मैंने फिर प्रवक्ता की मुद्रा अपनायी , " देखिये ये जो बुजुर्ग होते हैं इनकी यही तकलीफ होती है। ये चाहे घर में हों या पार्टी में, हर रोज बिना मांगे सलाह देते रहते हैं। हम तो मार्गदर्शक मंडल का नाम मूक दर्शक मंडल रखना चाहते थे लेकिन मीडिया ने फंसा दिया। अब तो ये इतना ज्यादा बोलते हैं की इनको राज्य पाल बनाने में भी डर लगता है। "                 

 

Wednesday, December 16, 2015

Opinion -- क्या बीजेपी संसद नही चलाना चाहती ?

संसद का पूरा पिछला सत्र और लगभग पूरा होने को आया ये सत्र भी राज्य सभा में लगभग बिना कामकाज के समाप्त होने जा रहा है। बीजेपी इसके लिए विपक्ष और विशेषकर कांग्रेस के हंगामे को जिम्मेदार बता रही है तो दूसरी तरफ कांग्रेस इसे बीजेपी द्वारा जानबूझ कर की गयी उकसावे की कार्यवाहियों का नतीजा बता रही है। एक GST बिल जरूर ऐसा था जिस पर विपक्ष और सत्तापक्ष के बीच गहरे मतभेद हैं लेकिन उस बिल के तो पेश होने का समय ही नही आया। जिन बिलों पर सरकार और विपक्ष के बीच बहुत ज्यादा मतभेद होते हैं उन बिलों को पेश होने से रोकने के लिए हंगामे की पुरानी परम्परा रही है। लेकिन उसके अलावा कुछ दूसरे तात्कालिक कारण भी होते हैं जिनकी वजह से संसद में हंगामा होता है।
                    इस तरह के कारणों के पैदा होने पर सरकार की फ्लोर-मैनेजमेंट उस पर कोई ना कोई रास्ता निकाल कर संसद की कार्यवाही को चलाते हैं ताकि सरकारी कामकाज को निपटाया सके। अगर संसदीय कार्य मंत्री और उनके उनके साथी ये काम नही कर पाते तो सरकार के बड़े नेता और प्रधानमंत्री विपक्ष के नेताओं से बातचीत करके रास्ता निकालते हैं। अब तक यही परम्परा रही है। लेकिन बीजेपी सरकार ने इस परम्परा को समाप्त कर दिया। अगर विपक्ष किसी मामले पर संसद में हंगामा करता है तो बीजेपी के सांसद सामने से हंगामा करते हैं। विपक्ष के नेताओं पर फिकरे कसे जाते हैं और आरोप लगाये जाते हैं।  तरह बीच का रास्ता निकलने की हर संभावना को समाप्त कर दिया जाता है।
                      अब ये तो नही माना जा सकता की बीजेपी के नेताओं को इस बात का पता नही है। इसका मतलब ये है की खुद बीजेपी नही चाहती की संसद चले। इस दौरान कुछ घटनाएँ तो एकदम आश्चर्य पैदा करने वाली हैं। केजरीवाल के दफ्तर पर सीबीआई का छापा और अरुणाचल में गवर्नर द्वारा कांग्रेस की सरकार को अस्थिर करने की कार्यवाही इसी तरह की घटनाएँ हैं। ठीक उस समय ये कार्यवाही करना जब संसद में महत्त्वपूर्ण बिलों पर विपक्ष के सहयोग की सख्त जरूरत है सरकार की संसद को चलाने की अनिच्छा को ही दिखाता है।
                     दूसरा मामला GST बिल पर मतभेदों का है। सरकार ने एक बार कांग्रेस को छोड़कर किसी भी विपक्षी नेता से इस बारे में बात नही की। कांग्रेस के साथ बातचीत के बाद इस बिल पर सरकार की तरफ से कोई रास्ता निकलने की कोशिश नही की गयी। इतना ही नही, कांग्रेस द्वारा मोदीजी के साथ मीटिंग में अपना पक्ष रखे जाने के 12 दिन बाद तक सरकार ने अपनी राय तक नही बताई, बस मीडिया में अपील करते रहे ताकि लोगों को दिखाया जा सके की सरकार कोशिश कर रही है। उसके बाद जब कांग्रेस ने मीडिया में इस बात को रखा तब सरकार ने कांग्रेस को अपना पक्ष भेजा। इस पर कांग्रेस के एतराज और उस पर सरकार का रिस्पॉन्स इस प्रकार है।
१. कांग्रेस ने GST बिल में टैक्स की अधिकतम सीमा 18 % रखे जाने और इसे बिल में शामिल करने की मांग की।
सरकार ने इसके जवाब में कहा की इसे बिल में नही रखा जा सकता।
२. कांग्रेस ने अंतर राजीय व्यपार पर १% अतिरिक्त टैक्स को समाप्त करने की मांग की।
 सरकार ने इसके जवाब में कहा की उसे इस पर गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से बात करनी पड़ेगी और सरकार अपनी तरफ से इसे नही हटा सकती।
३. कांग्रेस ने विवाद की स्थिति में 75% की सदस्य संख्या के फैसले की मांग रखी।
सरकार ने इस पर असहमति जाहिर की।

            इसका सीधा सीधा मतलब ये हुआ की सरकार कुछ भी मानने के लिए तैयार नही है। अब बताइये इस पर रास्ता निकालने के लिए सरकार ने क्या किया ?
            इसलिए अब लोगों की ये राय बनने लगी है की खुद बीजेपी नही चाहती की संसद चले।

Tuesday, December 15, 2015

मोदी सरकार की उपलब्धियां

खबरी -- पिछले डेढ़ साल में मोदी सरकार की क्या उपलब्धियां रही हैं ?

गप्पी -- एक तो ये की हम दस लाख का सूट पहन सकते हैं, दुनिया की सबसे ऊँची मूर्ति 3000 करोड़ की लागत से हम बना रहे हैं , एक लाख करोड़ की लागत से बुलेट ट्रेन लेकर आ रहे हैं , विदेशों में 50000 लोगों के शो आयोजित कर सकते हैं।
              दूसरी तरफ  विदेश नीति के मामले में, देश पर विदेशी कर्ज के मामले में, देश में धार्मिक और जातीय समुदायों में अविश्वास के मामले में, संघीय ढांचे और लोकतान्त्रिक संस्थाओं के मामले में इतना नुकसान पंहुचा चुके हैं की अगर आज से भी इन्हे सुधारना शुरू करें तो हमे दशक लग जायेंगे।

Monday, December 14, 2015

Opinion -- आम सहमति का मतलब --- सरकार से सहमति

                    देश में बहुत बार आम सहमति की बात होती है। जब भी आर्थिक मामलों की बात चलती है तो ये कहा जाता है की देश में आर्थिक सुधारों को लेकर आम सहमति है। ये भी कहा जाता है की आर्थिक मामलों पर आम सहमति होनी चाहिए और उस पर राजनीती नही होनी चाहिए। विदेश मामलों में तो खासकर आम सहमति की बात की जाती है और ये दावा किया जाता है की कम से कम विदेश नीति के मामले में तो देश में आम सहमति है।
                    लेकिन पिछले कुछ सालों से आम सहमति के मायने बदल गए हैं। खासकर जब से आर्थिक सुधारों का दौर शुरू हुआ है इस बात पर खास जोर दिया जा रहा है। अब आम सहमति का मतलब हो गया है सरकार के साथ सहमति। यदि कोई किसी नीति पर सवाल उठाता है तो उसे ये कहकर हड़काया जाता है की वो कम से कम इस मामले में तो आम सहमति बनाये। दूसरे शब्दों में उसे इस बात के लिए मजबूर किया जाता है की वो सरकार की हाँ में हाँ मिलाये। अगर कोई सवाल उठाता है तो कहा जाता है की वो राजनीती कर रहा है। और राजनीती करने को बहुत बुरा माना जाता है। जब से आर्थिक सुधारों का ये दौर शुरू हुआ है सारी नीतियां कॉर्पोरेट को ध्यान में रखकर और उसके फायदे के लिए बनाई जाती हैं। भले ही लोगों की आँखों में धूल झोंकने के लिए उसे कोई नाम  दिया जाये।
                      दूसरी जो बात इस तथाकथित आम सहमति के नाम पर सामने आई है वो ये है की दो पार्टियों, यानि बीजेपी और कांग्रेस की सहमति को आम सहमति मान लिया गया है। उसके बाद चाहे सरकार हो या कॉर्पोरेट के लोग हों, या कॉर्पोरेट का मीडिया हो या फिर टीवी चैनलों में बैठे हुए विशेषज्ञ हों, सब एक ही राग अलापते हैं की इस मामले पर आम सहमति है। जबकि असलियत ये है की उन दोनों को मिले वोट का प्रतिशत  बहुत बार 50 % से कम होता है। बाकि राजनैतिक दलों से  ना कोई बात की जाती है और ना ही उनकी राय को कोई महत्त्व दिया जाता है। जब सिद्धांतों की बात होती है तो सरकार कॉपरेटिव फडरेलिज्म की बात करती है और संघीय ढांचे की आरती उतारती है।
                        GST बिल के सवाल पर ये बात बहुत ही मुखर होकर सामने आ रही है। बीजेपी ने इस बिल पर किसी पार्टी से कोई बात करने की कोशिश नही की। केवल देश के विकास की हवा का दबाव बना कर इसका समर्थन करने के लिए कहा गया। वो तो कांग्रेस के साथ उसके रिश्ते खराब होने के चलते उसे उसके साथ बातचीत करने के लिए मजबूर होना पड़ा। अगर उसके पास राज्य सभा में बिल पास करने लायक बहुमत होता तो वो कांग्रेस की तरफ मुड़ कर भी नही देखती। लेकिन इन हालात के बावजूद उसने बाकि राजनितिक पार्टियों के साथ संवाद की कोई कोशिश नही की। हमारे यहां आम सहमति का केवल यही मतलब है की अगर आपका काम निकल गया तो किसी को पूछने की जरूरत नही है।
                          विदेश नीति  पर भी अजब नजारा सामने है। सरकार का मानना है की अगर वो किसी देश को गालियां देती है तो पुरे विपक्ष को उसे गालियां देनी चाहिए और अगर वो उसके साथ गलबहियां डाल कर घूमती है तो पूरे विपक्ष को तालियां बजानी चाहियें। अगर कोई ये सवाल पूछता है की भाई गाली देने का कारण बताइये तो चारों तरफ से उस पर फिटकार डाली जाती है की देखो, देखो इस देशद्रोही को विदेशी मामले पर भी राजनीती कर रहा है। इस सरकार की पाकिस्तान नीति हो या फिर नेपाल नीति ये हमेशा सवालों के घेरे में रही हैं। विपक्ष की तो छोडो, इस सरकार के भक्तगण भी पाकिस्तान के बारे में उसकी पलटी पर खुद को एडजेस्ट नही कर पा रहे हैं।
                          उसके बाद भी अगर विपक्ष का कोई दल अपना विरोध सख्त करता है तो सरकार का तर्क होता है की संसद में चर्चा के लिए सरकार तैयार है। बीजेपी की ये सरकार बनने के बाद संसद की चर्चा का मतलब भी वही हो गया है। जिन मामलों में पुरे देश में चिंता और बहस का माहोल था उन पर भी चर्चा का ये हाल था की सरकार चर्चा से पहले जो कहती रही वही चर्चा के बाद भी कहती रही। असहिष्णुता के मामले  में चर्चा हुई। पुरे विपक्ष ने सैकड़ों उदाहरण दे कर इस खतरे को सामने रक्खा लेकिन सरकार ने वही रुख अपनाया जो चर्चा से पहले था। किसी एक सवाल पर उसने इतना तक नही कहा की सरकार इसको देखेगी या कोई कदम उठाएगी। उसके बाद अगर कोई इस मामले पर बात करता है तो सरकार का जवाब होता है की इस मामले पर संसद में चर्चा हो चुकी है और संसद ( असल में सरकार ) उसे ख़ारिज कर चुकी है। फिर किसी मामले पर सरकार कहती है की विपक्ष इस पर संसद में चर्चा क्यों नही कर रहा ? भई वो इसलिए नही कर रहा की उसे मालूम है की सरकार पर जो टेप चढ़ी हुई है वही बजने वाली है। सरकार विपक्ष की किसी भी जायज चिंता को स्वीकार करने को तैयार नही है।                          



Comment on News -- प्रधानमंत्री, एयरपोर्ट और मूडीज की रिपोर्ट ( Prime Minister, Airport and Moody,s Report )

अभी अभी मूडीज की रिपोर्ट आई है। उसमे भारत की रेटिंग को बरकरार रखते हुए  "स्थिर आउटलुक " दिया गया है। उसके साथ ही इंडोनेशिया , थाईलैंड , सिंगापुर , मलेशिया और फिलीपींस को " पॉज़िटिव आउटलुक " दिया गया है। लेकिन हमारे प्रधानमंत्री जी और पूरी बीजेपी शोर मचा रहे हैं की पूरी दुनिया हमारी तरफ देख रही है। केवल हम ही दुनिया में सबसे आकर्षक निवेश स्थान हैं। लेकिन मूडीज की रिपोर्ट इसकी पुष्टि नही करती। भक्तों को ये बात बुरी लग सकती है।
             जब हमारे देश के प्रधानमंत्री विदेश जाते हैं तो वहां के लिए कुछ तोहफे ले जाते हैं। वहां के प्रधानमंत्री और दूसरे लोग भी हमारे प्रधानमंत्री को तोहफे देते हैं। ये एक सामान्य शिष्टाचार है जो पूरी दुनिया में होता है। इन तोहफों में हमारे देश की कोई कलाकृति , कोई शाल या हाथ की बनाई हुई वस्तुएं होती हैं जो किसी ना किसी रूप में हमारी संस्कृति से जुडी होती हैं।
               लेकिन अभी अभी ये पता चला है की प्रधानमंत्री अपनी सिंगापुर यात्रा के दौरान हमारे देश के मुनाफे में चलते हुए दो एयरपोर्ट सिंगापुर की एक कम्पनी को तोहफे में दे आये।

Sunday, December 13, 2015

Opinion -- राष्ट्र प्रेम V/s राष्ट्रवाद

राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर ने कहा है की राष्ट्रीयता और युद्ध एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं। राष्ट्रीयता से उनका मतलब राष्ट्रवाद है। अति राष्ट्रवाद अमानवीय और खतरनाक होता है। यही राष्ट्रवाद दो देशों के बीच युद्ध की स्थिति पैदा करता है। यही राष्ट्रवाद एक ही देश के दो समुदायों के बीच संघर्ष और दुश्मनी भी पैदा करता है। एक बात जो सबसे महत्त्वपूर्ण है वो ये की ये राष्ट्रवाद किसी भी देश के लोगों का किसी भी रूप में भला नही करता। राष्ट्रवाद कभी भी राष्ट्रप्रेम नही होता बल्कि एक सीमा के बाद तो ये दोनों एक दूसरे के विरोधी होते हैं।
                  जो लोग दिमागी रूप से इस राष्ट्रवाद के शिकार होते हैं वो अनजाने में ही देश को नुकशान पहुंचाते रहते हैं।
              मशहूर लेखक चार्ल्स द गाल ने भी कहा है की, " अगर किसी के मन में अपने लोगों के प्रति प्रेम होता है तो ये राष्ट्र प्रेम होता है और अपने लोगों को छोड़कर बाकि लोगों के प्रति नफरत होती है तो ये राष्ट्रवाद होता है। "
               एक और मशहूर लेखक जार्ज ऑरवेल ने भी लिखा है की, " देश भक्ति और राष्ट्रवाद एक दूसरे के विरोधी चीजें हैं। देश भक्ति का मतलब किसी स्थान विशेष और जीवन शैली को सर्वश्रेष्ठ समझने वाली भावना होती है लेकिन इस भावना का व्यक्ति अपनी भावना किसी पर थोपता नही है, जबकि राष्ट्रवाद की भावना रखने वाला आदमी दूसरों पर अपने विचारों को थोपता है और चाहता है की इसे ही बाकि लोग स्वीकार करें। "
                 अगर मामला दो देशों के बीच का होता है तो एक देशभक्त दूसरे देशों और स्थानो के देशभक्तों का सम्मान करता है लेकिन  राष्ट्रवादी उनके प्रति नफरत का भाव रखता है। जब ये राष्ट्रवाद उग्र रूप धारण करता है तो युद्ध को जन्म देता है।
                  इसमें सबसे दिलचस्प बात ये होती है की खुद को राष्ट्रवादी समझने वाला व्यक्ति अपने ही देश के कानूनों का सम्मान नही करता। वह करों और भुगतानों से संंबंधित कानूनो का उलंघन करता है। टैक्सों की चोरी को अपना अधिकार समझता है और इन्हे राष्ट्रवाद की परिभाषा से बाहर समझता है। वो सभी तरह के गैरकानूनी काम करते हुए भी अपने आप को राष्ट्रवादी समझता रह सकता है। जबकि एक देशभक्त देश के कानूनों का सम्मान करता है और किसी भी ऐसे काम से बचता है जिससे देश को नुकसान हो सकता हो।
                  किसी भी देश की सरकार और उसमे रहने वाले अलग अलग समूहों के बीच नीतियों और कार्यक्रमों को लेकर मतभेद हो सकते हैं। किसी भी देश के लोग बहुत बार अपनी ही देश की सरकार के खिलाफ आंदोलन करते हैं। सरकार और जनता की समझ में बड़ा फर्क हो सकता है। जैसे हमारे ही देश में कई मामलों पर सरकार और लोगों के बीच मतभेद हैं। आदिवासियों के इलाकों में बड़े उद्योगों और खदानों को लेकर सरकार और लोगों के बीच मतभेद हैं। कई जगहों पर ये मतभेद टकराव का रूप भी ले लेते हैं। सरकार इन मतभेदों को कुचलने के लिए दमन का सहारा लेती है। विरोध करने वाले समूहों पर देश विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाती है। लेकिन इसका ये मतलब कतई नही होता की ये जन समूह असल में देश विरोधी हैं। भूमि के सवाल पर किसानो और सरकार के बीच संघर्ष होता है। सरकार किसानो पर देश का विकास रोकने का आरोप लगाती है तो इसका ये मतलब भी कतई नही होता की ये किसान विकास विरोधी हैं। लेकिन एक राष्ट्रवादी बिना सोचे विचारे वही भाषा बोलता है जो सरकार बोलती है। और वो इन सब लोगों को देश द्रोही मानता है।
                    सबसे हास्यास्पद स्थिति तो तब पैदा होती है जब सरकार अपनी नीति पर पलटी मारती है। तब बेचारे इन राष्ट्रवादियों को भी पलटी मारनी पड़ती है।
                  इसलिए राष्ट्रवाद और देशभक्ति को एक ही चीज समझने की भूल नही करनी चाहिए।
                  

Saturday, December 12, 2015

Comment on News -- बुलेट ट्रेन का सपना और हमारी स्थिति

जापान के साथ बुलेट ट्रेन का जो करार हुआ है उसकी आलोचना करने वालों को टीवी चैनल और उस पर बैठे सरकारी विशेषज्ञ उन्हें विकास और रोजगार का हवाला देकर चुप करवा रहे हैं और ऐसा माहोल बना रहे हैं जैसे बुलेट ट्रेन के आते ही भारत जापान में बदल जायेगा। लेकिन हमारी असली स्थिति क्या है ?
                 रेलवे की हालत बहुत ही खराब है। उसकी पटरियां पुरानी हो चुकी हैं और उसके कई पुलों की उम्र तो निधारित समय से दुगना समय गुजार चुकी है। ट्रेनों के डब्बे पुराने हो चुके हैं और बहुत बार दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं। पिछले दिनों जो रेल दुर्घटना हुई थी वो बगैर गार्ड के फाटक पर जीप के ट्रेन से टकराने की वजह से हुई थी। हमारे देश में अभी भी बिना चौकीदार की बहुत सी रेलवे फाटक हैं। दुर्घटनाओं को रोकने के लिए जो नया सिस्टम है उसको अभी हम सभी जगह नही लगा पा रहे हैं। अभी भी बहुत सी जगह छोटी लाइन है जिसे बड़ी लाइन में बदलना हमारे बजट से बाहर है। रेलवे सुरक्षा के लिए रेलवे सुरक्षा बल में बहुत सी जगह खाली हैं जिन्हे नही भरा जा रहा है। और रेल लाइनो का बिजलीकरण करने में तो हमे बहुत साल लगने वाले हैं।
                  पिछले साल का बजट हमारे रेल बजट के इतिहास का इकलौता ऐसा बजट था जिसमे एक भी नई योजना और एक भी नई ट्रेन की घोषणा नही की गयी थी। इसके लिए ये तर्क दिया गया था की अभी पिछली अधूरी और शुरू नही की गयी योजनाओं में बहुत काम बाकि है। इसलिए पहले उसे पूरा किया जायेगा और उसके बाद नई ट्रेन या योजनाएं घोषित की जाएँगी।
                  अब जब 98000 करोड़ की बुलेट ट्रेन योजना जापान से कर्जा लेकर शुरू की जा रही है तो क्या बाकि सभी योजनाएं पूरी हो चुकी हैं। ये सरकार हमेशा अपनी सुविधा के अनुसार अपने तर्क बदलती रही है। ये योजना अगर पूरी भी हो जाये तो भी इसका किराया इतना महंगा होगा की देश के 95 % लोगों की ओकात के बाहर होगा। अहमदाबाद से मुंबई तक की केवल 540 किलोमीटर की यात्रा के लिए 98000 करोड़ का खर्च एक बड़ा बोझ तो होगा ही साथ में एक क्षेत्रीय असंतुलन भी पैदा करेगा। इसकी लागत और इसकी कलेक्शन के बीच ऐसा ना हो की हर साल एयर इंडिया की तरह बजट से पैसा डालना पड़े।
                    जो लोग इस परियोजना से देश में रोजगार पैदा होने का तर्क दे रहे हैं उनसे मैं केवल इतना पूछना चाहता हूँ की अगर हमारी मौजूदा रेल की व्यवस्था सुधारने के लिए सामान का उत्पादन किया जाता तो क्या उससे रोजगार पैदा नही होता। जापान से कर्ज लेकर काम करना था तो वो उन क्षेत्रों में भी हो सकता था। बल्कि इससे ज्यादा रोजगार पैदा हो सकता था।
                      सपने देखना कोई बुरी बात नही है , लेकिन ओकात के बाहर के और अव्यवहारिक सपने देखना खतरनाक हो सकता है।

Friday, December 11, 2015

बीजेपी का दोहरा रुख, दोहरी बातें और दोहरा चरित्र

बीजेपी जब से सत्ता में आई है उसने अपनी पहले कही गयी कई बातों पर पलटी मारी है। जब तक ये बात केवल नारों और वायदों तक सिमित थी तब तक तो ठीक था और लोग केवल मजाक उड़ाकर चुप रह जाते थे। लेकिन जब ठीक इसी तरह का मामला कामकाज के दौरान भी सामने आने लगा तो उसका विरोध होने लगा। संसद का पिछला सत्र बीजेपी नेताओं के भृष्टाचार के मामले पर हंगामे की भेंट चढ़ गया और अब ये सत्र भी बिना कोई कामकाज किये समाप्ति की और है। बीजेपी के पलटी मारने के इतने उदाहरण सामने हैं की अब तो लोगों को उन पर आश्चर्य होना भी बंद हो गया है। जैसे -

पहले --- बीजेपी नेता पूरा सत्र हंगामे के द्वारा खत्म कर देते थे और कहते थे की संसद चलाना सरकार की जिम्मेदारी होती है और संसद का काम रोकना भी लोकतंत्र में विरोध का एक तरीका होता है।

अब -- बीजेपी नेता कहते हैं की संसद में काम रोकना देश के विकास को रोकने का प्रयास है और संसद चलाना सरकार और विपक्ष दोनों की बराबर की जिम्मेदारी होती है।

पहले -- जब भूमि बिल पर बीजेपी ने सरकार में आते ही पलटी मारी और इस पर जवाब में कहा की नई जरूरतों के अनुसार अपने विचारों में बदलाव करना कोई बुरी बात नही है।

अब -- GST बिल पर कांग्रेस द्वारा रक्खी गयी तीन मांगों पर वह कह रही है की ये मांगे तो कांग्रेस द्वारा पेश किये गए बिल में भी नही थी और अब कांग्रेस द्वारा अपने रुख में बदलाव लोगों के साथ धोखेबाजी है।

पहले -- कांग्रेस और विपक्ष के दूसरे नेताओं पर भृष्टाचार के आरोपों पर उसका कहना था की जब शिकायत मिली है तो जाँच करवाने में सरकार क्यों हिचक रही है। अगर कुछ गलत नही हुआ है तो अपने आप सामने आ जायेगा इसमें डरने की क्या बात है।

अब -- जब उसके नेताओं के भृष्टाचार की जाँच की मांग हो रही है तो उसका कहना है की अगर कोई पुख्ता सबूत विपक्ष के पास है तो उसे अदालत जाना चाहिए , केवल शिकायतों के आधार पर जाँच नही की जाएगी।

पहले -- जब पवन बंसल के भांजे किसी से पैसे लेते हुए पकड़े गए थे तो उसने कहा था की पवन बंसल को इस्तीफा देना चाहिए क्योंकि आखिर उनकी बिना पर ही तो उसके भांजे ने पैसा लिया होगा।

अब -- जब छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री का साला पैसे लेते हुए पकड़ा गया तो बीजेपी का कहना है की कोई मुख्यमंत्री अपने सभी रिश्तेदारों की जिम्मेदारी कैसे ले सकता है।

पहले -- जब UPA सरकार पाकिस्तान के साथ  रही थी तो उसने ये कह कर उसका विरोध किया की जब तक सीमा पर गोलीबारी और पाकिस्तान द्वारा आतंकवादियों का समर्थन बंद नही किया जाता कोई बात नही होनी चाहिए।

अब -- जब सरकार कश्मीर पर भी बात करने को तैयार हो गयी है तो उसका कहना है की आखिर रास्ता तो बातचीत से ही निकलेगा।

                        इस तरह की पलटियां तो आप चाहे लगातार दो महीने लिखते रहें पूरी नही होंगी।

ओक्टुबर IIP के आंकड़े 9. 8 % और उनका विश्लेषण

ओक्टुबर IIP के आंकड़े 9. 8 % आये और उस पर इकोनॉमी में तेजी का दावा किया जा रहा है। लेकिन अगर इस आंकड़े को ठीक से देखा जाये तो पता चलता है की इसमें सारी बढ़ोतरी कंज्यूमर ड्यूरेबल्स के उत्पादन में बढ़ोतरी की वजह से हुई है। पिछले साल अक्टूबर में कंज्यूमर ड्यूरेबल का आंकड़ा -4.6 % था और इस बार ये आंकड़ा 42.2  % पर है।
                    इसका एक मुख्य कारण ये है की इस साल दिवाली नवंबर के महीने में थी और दिवाली पर होने वाली कंज्यूमर ड्यूरेबल्स का उत्पादन अक्टूबर के महीने में हुआ है। और उसकी तुलना पिछले साल के अक्टूबर से की जा रही है।
                     कुछ दिन पहले आये कोर-सेक्टर के आंकड़े कमजोर थे और किसी भी अर्थव्यवस्था में सुधार के असली संकेत कोर- सेक्टर यानि बिजली, स्टील और खान जैसी आधारभूत क्षेत्रों में सुधार से मिलते हैं। इसलिए अक्टूबर IIP  आंकड़ों से कोई स्थाई नतीजा निकालने से पहले अगले तीन-चार महीनो के आंकड़ों पर ध्यान रखने की जरूरत है।

Thursday, December 10, 2015

हरियाणा सरकार की चुनावी शर्तों पर उच्चत्तम न्यायालय का फैसला

आज देश  दो बड़े फैसले आये। एक फैसले में उच्चत्तम न्यायालय ने हरियाणा सरकार द्वारा स्थानीय निकाय  के चुनावों में लगाई गयी न्यूनतम शिक्षा व अन्य शर्तों के खिलाफ दायर याचिका को ख़ारिज कर दिया। इस फैसले के आने के बाद हरियाणा में लगभग 82 % लोग चुनाव लड़ने की योग्यता खो चुके हैं। अब ये लोग किसी भी स्थानीय निकाय का चुनाव नही लड़ सकते।
            अभी पिछले हफ्ते संसद में संविधान दिवस मनाया गया। उस अवसर पर बोलते हुए माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा था की सार्वभौमिक मताधिकार हमारे संविधान की सबसे बड़ी ताकत है और इसके बिना लोकतंत्र की कल्पना भी नही की जा सकती। उन्होंने बीजेपी शासित राज्यों में इस अधिकार को सिमित करने वाले नियम लागु करने की आलोचना करते हुए हरियाणा सरकार के इस कानून का विशेष तौर पर जिक्र किया था और इसे लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ बताया था।
              लेकिन उसके एक हफ्ते बाद ही उच्चत्तम न्यायालय द्वारा इस पर मुहर लगाना लोगों  आश्चर्य में डालने वाला है। पहले जब महिलाओं को मताधिकार प्राप्त नही था तब उस व्यवस्था के समर्थक भी ये तर्क देते थे की महिलाएं राजकाज के बारे में कम जानती हैं। कुछ देशों में जिनके पास सम्पत्ति नही होती थी तो उनको वोट डालने का अधिकार नही होता था। अब शिक्षा की कमी होने, घर में पक्का शौचालय ना होने और किसी बैंक का कर्ज बाकि होने पर चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराया जा रहा है। ऐसा तो नही है की पिछला जमाना लौट रहा हो और देश के अनपढ़, गरीब, भूमिहीन, घरविहीन लोगों को चुनावी प्रक्रिया से बाहर किया जा रहा हो।
                बाद में कोई सरकार फिर से सम्पत्ति के आधार पर वोट की कीमत तय कर सकती है। आखिर ऐसा कैसे हो सकता है की एक ठेला लगाने वाले और मुकेश अम्बानी दोनों के वोट की कीमत एक जैसी हो।
               चार दिन पहले माननीय न्यायमूर्ति और उच्चत्तम न्यायालय के नवनियुक्त मुख्य न्यायाधीश महोदय ने देश की जनता को भरोसा देते हुए कहा था की जब तक स्वतंत्र न्यायपालिका है किसी को डरने की जरूरत नही है। लेकिन अब उसी उच्चत्तम न्यायालय ने एक राज्य के बहुमत  लोगों को चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहरा दिया।
                 देश में गरीब और शोषित लोगों के खिलाफ एक अनदेखी का भाव बढ़ रहा है। विकास के नाम पर ऐसे प्रोजैक्टों को मंजूर किया जा रहा है जिनसे बहुत बड़े पैमाने पर आदिवासियों और दूसरे लोगों का विस्थापन होता है। और उनके पुनर्वास के लिए कोई पुख्त योजना नही होती है। सालों से इस तरह के उजड़े हुए लोग अब भी सड़क पर जीवन गुजारने को मजबूर हैं।
                  इस दौरान ऐसे मामलों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है जब  किसी उद्योग में हड़ताल होने पर न्यायालय तुरंत उस पर रोक लगा देता है। लेकिन देश में न्यूनतम वेतन लागु नही है ये न्यायालय की परेशानी नही है। जो लोग ये कहते हैं की न्यायालय भी वर्गीय शासन का हिस्सा होता है और निष्पक्ष न्यायालय जैसी कोई चीज वजूद में नही है क्या वो सही हैं ?
                     पिछले दिनों उपहार सिनेमा के फैसले के बाद जिन लोगों की ये धारणा बनी थी की पैसे वाले लोगों को सजा दिलाना मुश्किल होता जा रहा है आज सलमान खान के फैसले के बाद उनकी ये अवधारणा और मजबूत होगी।                  


Wednesday, December 9, 2015

तुम कैसे मर सकते हो -- विद्रोही --

तुमने कहा था की तुम्हारे मरने से पहले
जन-गण-मन अधिनायक मरेंगे
फिर भारत भाग्य विधाता मरेंगे
और तुम उसके बाद मरोगे
लेकिन ये कौन है
जो तुम्हारी मौत की खबर दे रहे  है
और
अगर तुम सचमुच मर गए
तो ये विरोध की आवाजें कहां से आ रही हैं
और कहां से आ रही हैं
विद्रोही गीतों की स्वरलहरी
तुम्हारी मौत की खबर देने वाले झूठे हैं
तुम पहले मर ही नही सकते
विद्रोही
तुमसे पहले जन-गण-मन अधिनायक मरेंगे
फिर भारत भाग्य विधाता मरेंगे
उसके बाद शायद
तुम्हारे मरने की जरूरत ही ना पड़े।

Comment and Question on news ---आखिर पैसा कहां गया ?

पिछले डेढ़ साल में मोदी सरकार ने जिन उपलब्धियों का दावा  किया है उनमे सबसे बड़ी उपलब्धि ये है की उसने भृष्टाचार रोककर और देश के संसाधनो के पारदर्शी नीलामी के द्वारा लाखों करोड़ रूपये देश की तिजोरी में डाले हैं। कुछ लोग इन घोषणाओं पर सवाल भी खड़े करते रहे हैं लेकिन सरकार अपने दावों पर अडिग रही है। ये दावे कुछ इस प्रकार हैं।
१. कोयला खदानों की नीलामी से 335000 करोड़ रुपया इकट्ठा करके देश की तिजोरी में डाला गया है। http://timesofindia.indiatimes.com/india/Smriti-Irani-hits-back-at-Sonias-hawa-baazi-jibe/articleshow/48871717.cms  

२. 2 G की नीलामी से करीब 150000 करोड़ रुपया देश के खजाने में डाला गया।
३.  दूसरे खनिज की खदानों की नीलामी का पैसा खजाने में डाला गया।

उसके बाद सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की नीलामी करके हजारों करोड़ रुपया इकट्ठा किया है। सरकार टैक्स की कमाई बढ़ने का दावा भी कर रही है। उसके बाद जो खर्चे की रिपोर्ट है वो इस प्रकार है।

१. मनरेगा में खर्च किये जाने वाले बजट में कटौती की गयी है।
२. बच्चों के दोपहर भोजन के खर्चे में कटौती की गयी है।
३. शिक्षा पर किये जाने वाले खर्चे में कटौती की गयी है।
४. स्वास्थ्य पर खर्च किये जाने वाले बजट में कटौती की गयी है।

इसके अलावा भी कई खर्चों में कटौती की गयी है। मैं कोई बजट का विश्लेषण नही कर रहा हूँ इसलिए सारे आंकड़े यहां देना जरूरी नही है। मैं केवल इस हफ्ते में आई दो खबरों पर सवाल करना चाहता हूँ।

१. सरकार ने खाद उत्पादन करने वाले उद्योगों को कह दिया है की उनकी सरकार की तरफ बकाया 40000 करोड़ रूपये का भुगतान करने की स्थिति में सरकार अभी नही है। इसलिए उन्हें इसके लिए इंतजार करना होगा।
२.  चुनाओं के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार के लिए 1 लाख 65 हजार करोड़ के पैकेज की घोषणा की थी। लेकिन अब खबर आई है की केंद्र ने बिहार में बनने वाली ग्रामीण सड़क योजना की फाइल ये कहकर लोटा दी की केंद्र इसके लिए अब 100 % रकम नही दे पायेगा और केवल 60 % रकम ही दे पायेगा।

मैं केवल ये पूछना चाहता हूँ की इतना पैसा आखिर कहां ? या तो सरकार पैसा इकट्ठा करने के झूठे दावे कर रही थी या फिर सरकार कुछ ऐसे खर्चों को छुपा रही है जिनको वो आम जनता को नही बताना चाहती। इस सवाल का जवाब दिया जाना चाहिए।

Tuesday, December 8, 2015

Vyang -- शज़िआ इल्मी से एक काल्पनिक इंटरव्यू

कल मुझे एकाएक ख्याल आया की दिल्ली की मौजूदा हालत पर आम आदमी पार्टी की भूतपूर्व और बीजेपी की अभूतपूर्व नेता शज़िआ इल्मी का इंटरव्यू लेना चाहिए। मैं ये सोच ही रहा था की एक चैनल पर मुझे शज़िआ इल्मी दिखाई दे गयी। लगे हाथ मैंने भी उनसे कुछ सवाल पूछ लिए। पूछे गए सवाल और उनके जवाब इस प्रकार हैं।

सवाल -- दिल्ली में प्रदूषण को ---------

जवाब -- ( मेरा सवाल बीच में काटकर ) दिल्ली की तो बात ही मत करो। यहां तो प्रदूषण से ऐसा लगता है की     जैसे हम गैस चैंबर में रह रहे हैं। लेकिन यहां तो अंधेर नगरी चोपट राजा है। यहां की सरकार को तो कुछ पड़ी नही है।

सवाल -- लेकिन में ये कह रहा था की दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने प्रदूषण कम करने के लिए कारों के लिए ओड -ईवन का फार्मूला लागु करने की बात कहि है।

जवाब -- मैंने कहा न, की यहां तो अंधेर नगरी चोपट राजा वाली बात है। इस तरह आधी गाड़ियां बंद कर देने से लोगों को कितनी तकलीफ होगी क्या उसके बारे में किसी ने सोचा है ?

सवाल -- लेकिन सरकार का कहना है की वो पंद्रह दिन की ट्रायल पर ये फार्मूला लागु कर रही है। अगर इससे लोगों को तकलीफ हुई तो इसे वापिस ले लिया जायेगा।

जवाब -- मैंने कहा न , अंधेर नगरी चोपट राजा वाली बात है। अरे आपको खुद ही नही मालूम की आपका फार्मूला सही है या नही तो लागु क्या खाक करेंगे। कोई फार्मूला लागु करने के बाद उसे वापिस लेना कोई सरकार का काम थोड़ा होता है।

सवाल -- लेकिन कोई फार्मूला लागु करने के बाद अगर ये मालूम पड़ता है की ये सही नही है तो उसे वापिस लेने में क्या हर्ज है ?

जवाब -- हर्ज क्यों नही है। इससे सरकार की कमजोरी दिखाई देती है। हमने FTII में गजेन्द्र चौहान को नियुक्त किया, सारा देश जानता है की ये फैसला गलत था। हम भी जानते हैं। लेकिन क्या हमने इसे वापिस लिया ? इससे सरकार की कमजोरी दिखती है। लेकिन दिल्ली में तो अंधेर नगरी चोपट राजा वाली बात है।

सवाल -- तो क्या आप बताएंगी की दिल्ली की सरकार को क्या करना चाहिए ?

जवाब -- मैं क्यों बताउंगी ? हाँ लेकिन दिल्ली की सरकार को जनता के हित में काम करना चाहिए। आपको मालूम है की बच्चों की क्या हालत है , बूढ़े और बीमार लोगों की क्या हालत है ?

सवाल -- सरकार इसके लिए प्रदूषण इंडेक्स लाने की बात कर रही है। प्रदूषण ज्यादा होने पर चीन की तरह एक-दो दिन स्कूलों की छुट्टी की जा सकती है।

जवाब -- फिर व्ही अंधेर नगरी चोपट राजा  वाली बात। अगर स्कूलों की छुट्टी की जाएगी तो बच्चों को पढ़ाई का क्या होगा ? आपकी योजना ज्यादा जरूरी है या बच्चों की पढ़ाई ज्यादा जरूरी है ? ये जो कारखाने दिन रात धुआं उगलते हैं उनके लिए आपने क्या किया ?

सवाल -- सरकार का कहना है की वो एक हफ्ते के अंदर थर्मल पावर प्लांट बंद करने जा रही है। और बाकि उद्योगों के लिए सख्त नियम लेकर आ रही है।

जवाब -- अगर आप पावर प्लांट बंद कर देंगे तो उसके मजदूरों का क्या होगा ? और दिल्ली के प्रदूषण का बोझ कारखानो पर डालना कहां की समझदारी है। सरकार को दूसरे उपाय सोचने चाहियें।

सवाल -- लेकिन प्रदूषण के मुख्य जिम्मेदार तो वाहन और कारखाने ही हैं।

जवाब -- नही , उसके अलावा जो कारण हैं उनको खोजा जाना चाहिए और दूर किया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा नही होगा क्योकि यहां तो अंधेर नगरी चोपट राजा है।

उसके बाद मुझे चैनल वाले ने बाहर निकाल दिया। वरना वो मुझे प्रदूषण से मुक्ति का उपाय बताने ही वाली थी।

Comment -- नेशनल हेराल्ड, GST बिल, संसद और मीडिया

आज संसद में नेशनल हेराल्ड के मामले में कांग्रेस और बाकि विपक्षी पार्टियों के हंगामे के बाद हमारे कॉर्पोरेट क्षेत्र को बुखार हो आया। सेंसक्स 220 पॉइंट लुढ़क गया और सारे टीवी चैनलों पर इस पर लगातार बहस के कार्यक्रम दिखाए जाने लगे। इन कार्यक्रमों को देखने से पता चलता है की हमारे देश में केवल एक ही समस्या है और वो है GST बिल का पास ना होना। सभी टीवी चैनलों पर बहस करवाने वाले एंकरों को दूसरे किसी बिल का नाम भी याद नही था। उन्हें ये भी याद नही था की संसदीय कार्य मंत्रणा समिति के अनुसार आज किस बिल पर बहस होनी थी। सारे एंकर, और खासकर बिजनेस चैनलों के एंकर तो GST का स्यापा कर रहे थे। और इस प्रक्रिया में कांग्रेस के प्रवक्ताओं पर बरस रहे थे।
                    ये बार बार साबित हो चूका है की कॉर्पोरेट क्षेत्र और उसके टीवी चैनलों की केवल एक ही चिंता है की किसी भी तरह उनके हित सधने चाहियें बाकि देश चाहे भाड़ में जाये। मैं मुकेश अम्बानी के चैनल CNBC आवाज से ये उम्मीद तो नही करता की वो रिलांयस द्वारा ONGC की गैस चुराकर बेचने पर कार्यक्रम करेंगे, लेकिन इतनी उम्मीद तो कर ही सकता हूँ की वो संसद के सामने पेश दूसरे एकाध बिल का नाम भी ले ले। लेकिन इस बेशर्म मीडिया से तो इतनी उम्मीद भी बेमानी ही है।

Sunday, December 6, 2015

Comment -- जरूरतमंदों को लूटने की तिकड़में

चेन्नई में भयानक संकट के बाद सारी रेल और विमान सेवाएं ठप्प हो गयी तो इसका फायदा उठाने के लिए सभी प्राइवेट विमान सेवा देने वाली कम्पनियों ने अपने किरायों में कई गुना बढ़ौतरी कर दी। बंगलोर से दिल्ली का किराया 80000 रूपये कर दिया। प्राकृतिक आफत और जरूरत के समय लोगों को इस तरह लूटने की इजाजत केवल हमारे देश में ही है। जब ये समय निकल जायेगा तो शायद सरकार का कोई बयान लीपापोती के लिए आये।
              इस तरह की लूट केवल प्राइवेट कंपनियां ही करती हों ऐसा भी नही है। त्योहारों के समय जब रेल यात्रियों की संख्या बढ़ जाती है तो रेलवे हमेशा कुछ अतिरिक्त रेलगाडियां चलाता है। लेकिन इस सरकार के आने के बाद और एक अकाउंटेंट के रेल मंत्री बनाये जाने के बाद हमारा रेल मंत्रालय हररोज लोगों को लूटने के नए प्रयोग करता है। इन अतिरिक्त गाड़ियों का किराया इस तरह रक्खा गया है की आम यात्री तो इनमे यात्रा करने की सोच भी नही सकता। इनका किराया कभी-कभी तो हवाई जहाज के किराये से भी ज्यादा होता है।  आम लोगों को राहत देने की बजाय लूट के नए नए तरीके निकाले जाते हैं।
               पिछले दिनों में रेलवे ने कभी प्लेटफार्म टिकट को दुगना महंगा करके, कभी रिजर्वेशन कैंसल करने का चार्ज बढ़ाकर और अब बच्चों की सीट छीनकर हर वो तरीका अपनाया है जिससे लोगों की जेब काटी जा सके।
                इसलिए विपक्षी पार्टियों को इस लूट का सख्ती से विरोध करना चाहिए। और प्राकृतिक आपदा के समय लोगों को लूटने वालों के खिलाफ कार्यवाही की मांग करनी चाहिए।

Friday, December 4, 2015

Comment-- महिला के छूने से अपवित्र हुई शनि की मूर्ति को दूध से धोने का क्या फायदा ?

कई दिन पहले ये खबर आई की एक महिला ने शिगनापुर के शनि मंदिर में घुसकर शनि देव की मूर्ति पर तेल चढ़ा दिया। सदियों से इस मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी है। इस महिला द्वारा किये गए इस काम से मंदिर के प्रबंधन के अनुसार अपवित्र हो चुकी शनि की मूर्ति को फिर से पवित्र करने के लिए उसे दूध से धोया गया।
             हमारे देश में और भी सैंकड़ों मंदिर हैं जो महिला के प्रवेश से अपवित्र हो जाते हैं और उनमे भी अपवित्र हो गयी मूर्ति को दूध से धोकर पवित्र किया जाता है। इस पर मुझे एक सवाल पूछना है।
              मेरा सवाल ये है की दूध तो केवल मादा जानवर देते हैं जो की दूसरे शब्दों में महिला की श्रेणी में ही आते हैं। तो फिर एक महिला के छूने से अपवित्र हुई मूर्ति दूसरी मादा के दूध से धोने पर पवित्र कैसे हो जाती है। क्या हमारे धर्म के ठेकेदार महिला को मादा जानवर से भी नीचे का दर्जा देते हैं ?
               मैं ये चाहता हूँ की जब तक महिलाओं के छूने से मूर्तियां अपवित्र होती रहें, तब तक इन प्रबंधकों को किसी पुरुष पदार्थ का इस्तेमाल इन्हे शुद्ध करने में करना चाहिए और दूध के तो मंदिर प्रवेश पर ही पाबंदी लगा देनी चाहिए। फिर मुझे याद आया की अगर ये लोग मादा उत्पादों पर पाबंदी लगाते हैं तो इनके दिए जलने बंद हो जायेंगे और शायद इन्हे याद आ जाये की ये खुद भी एक महिला या मादा की ही उपज हैं।

Thursday, December 3, 2015

Vyang -- दाऊद की सम्पत्ती और भक्तों की परीक्षा

पिछले दिनों ये खबर अख़बार में पढ़ी की मुंबई में सरकार दाऊद की  संपत्ति की नीलामी करने वाली है। इस खबर में ये भी लिखा था की सरकार कई बार इस सम्पत्ति की नीलामी की कोशिश कर चुकी है लेकिन कोई बोली लगाने को तैयार ही नही है। और पहले दिल्ली के दो लोगों ने दाऊद की एक संपत्ति की बोली लगाकर खरीद की थी उन्हें अब तक उसका कब्जा नही मिला है।
                   मुझे लगता है की ये खबर झूठी है और भारत को बदनाम करने के लिए छापी गयी है। इसमें भारत विरोध की बू साफ नजर आ रही है। जिन लोगों ने ये खबर छापी है उनको हमारे देश के बारे में कुछ भी जानकारी नही है।
                    हमारे यहां इस तरह के देश भक्तों की बहुत बड़ी तादाद है जो लोगों को हर रोज पाकिस्तान भेजते रहते हैं। ये लोग हर रोज दावा करते हैं की बस अभी कुछ दिन की ही बात है जब हमारी सरकार दाऊद को घसीट कर भारत लाने  वाली है। हमारे प्रधानमंत्री जिस देश में भी जाते हैं, वहां की सरकार को दाऊद की सम्पत्ति जब्त करने का आग्रह करना नही भूलते। फिर ऐसा कैसे हो सकता है की कोई दाऊद की सम्पत्ति की बोली लगाने से डर महसूस करे और वो भी मुंबई में।
                     मुंबई वो शहर है जहां केवल पाकिस्तान का नाम लेने पर मुंह काला किया जा सकता है। वहां की पार्टी अपने झंडे में शेर का फोटो लगाती है। वहां दाऊद की तो बात छोडो पाकिस्तान के किर्केटर और कलाकार नही घुस सकते और अख़बार कहता है की वहां दाऊद की सम्पत्ति की नीलामी नही हो पा रही।
                     लोगों को और अख़बार को शायद मालूम नही है की हमारे देश में वायु सेना, थल सेना, नौ-सेना के आलावा राष्ट्र सेना और हिन्दू सेना भी है। ये दोनों सेना हर रोज किसी कलाकार की फिल्म पर बैन लगा देते हैं और फिर सिनेमा हाल में तोड़फोड़ कर देते हैं। फिर किसी का सर काटने की धमकी दे देते हैं और मुस्कुराते हुए फोटो खिंचवाते हैं। इन लोगों को मलाल है की 1971 के युद्ध के समय वो नही थे वरना पाकिस्तान का नामोनिशान मिट जाता। और उनके शहर में कोई ये कहे की दाऊद की सम्पत्ति की बोली नही लग रही तो ये कैसे हो सकता है। इसलिए मैं मानता हूँ की ये खबर झूठ है
                     इस खबर के झूठे होने का दूसरा प्रमाण ये है देश की दोनों बड़ी राष्ट्रवादी पार्टियां वहां सरकार में हैं। दोनों में कौन ज्यादा राष्ट्रवादी है ये अभी साबित नही हुआ है लेकिन ये साबित हो चूका है कि इनके आलावा और कोई राष्ट्रवादी नही है। आप अगर सोशल मिडिया से थोड़ा बहुत संबंध रखते हैं तो आपको इनके भक्तों की एक पूरी ब्रिगेड वहां मिल जाएगी जो आपको साबित कर देगी की इनके आलावा ना तो कोई बहादुर है और ना ही कोई देशभक्त है। ऐसी पार्टियों के रहते मुंबई में दाऊद की सम्पत्ति का होना ही अपने आप में शर्म की बात है और उसका कोई खरीददार ना मिलना तो डूब मरने की बात है। मैं तो कहता हूँ की हे ( देश ) भक्तो उठो और साबित कर दो की तुम्हारे सामने दाऊद की की ओकात नही है।
                      लेकिन फिर मुझे याद आता है की जो लोग जवाहरलाल नेहरू को इस बात के लिए गालियां देते थे की 1947 में अगर उसने सेना को इजाजत दे दी होती तो पूरा कश्मीर भारत का होता। बाद में जब वो लोग खुद सरकार में आये तो कारगिल युद्ध में LOC पार करने की हिम्मत भी नही जुटा पाये।
                       इसलिए मुझे इन राष्ट्रवादी सेनाओं के राष्ट्रवाद पर शक होता है लेकिन उनकी हिम्मत पर मुझे कोई शक नही है। क्योंकि हिम्मत वाला आदमी इस तरह के टुच्चे काम नही करता जिस तरह के काम ये लोग करते हैं। किसी भी साधारण आदमी को गिरोह बना कर पीट देना और मिडिया में गाली गलोच कर देना हिम्मत की निशानी नही होती।  
                          इसलिए मैं इनका आह्वान करता हूँ, की हे राष्ट्र सेना और हिन्दू सेना के वीरो उठो, और दाऊद की सम्पत्तिओं पर कब्जा कर लो। और उसके बाद ललकार कर कहो की हाँ, हमने किया है कब्जा और दाऊद और उसके गुर्गों में अगर हिम्मत है तो हमारा कुछ बिगाड़ कर दिखाए।                   

 भक्तों की परीक्षा 

Tuesday, December 1, 2015

RBI द्वारा बैंक रेट और जीडीपी दर में वृद्धि की संभावना में कोई बदलाव नही

RBI द्वारा आज अपनी तिमाही मुद्रा नीति में बिना कोई बदलाव किये सभी तरह के बैंक रेट को स्थिर रक्खा गया। RBI द्वारा घोषित तिमाही समीक्षा के मुख्य बिंदु निम्न प्रकार से हैं।

१.  रेपो रेट बिना किसी बदलाव के 6.75 % ही रक्खा गया। उसी तरह रिवर्स रेपो रेट भी पिछली दर 5.75 % पर स्थिर रक्खा गया।

२.  RBI ने 2015 -16 के लिए जीडीपी वृद्धि दर के अनुमान को भी 7.4 % पर स्थिर रक्खा गया है। RBI का मानना है की अर्थ व्यवस्था में वृद्धि अभी बहुत ही शुरुआती दौर में है। और इसकी बढ़ोतरी दर्शाने वाले चिन्ह अभी मिक्स संदेश दे रहे हैं।

३.  ब्याज दरों में कटौती ना करने के एक कारण के बारे में उन्होंने कहा की RBI द्वारा की गयी कटौती को अभी बैंको ने ग्राहकों को पास-ओन नही किया है।

४.  RBI ने कहा है की अनियमित मॉनसून के कारण कृषि विकास पर बहुत दबाव है और उसमे ज्यादा बढ़ोतरी की उम्मीद नही है। और इसी वजह से ग्रामीण मांग में कमजोरी की संभावना है।

Monday, November 30, 2015

राज्य सभा के अधिकारों में कटौती पर बहस और सीधे चुनाव का संदर्भ

पिछले कुछ समय से राज्य सभा के अधिकारों पर बहस शुरू हो गयी है। ये बहस नई चुन कर आई हुई सरकार द्वारा बहुमत ना होने के चलते राज्य सभा से अपने संविधान संशोधन बिल पास ना करवा सकने के चलते शुरू हुई है। वित्त मंत्री ने भूमि बिल और GST बिल के राज्य सभा में अटक जाने के कारण बयान देते हुए कहा की बिना चुने हुए लोग, चुने हुए लोगों के काम को अटका रहे हैं और ये लोकतंत्र के लिए सही नही है। उसके बाद कई लोगों ने इस पर अपनी बात कहि है। इसमें अभी-अभी ताजा उदाहरण बीजू जनता दल के सांसद जय पांडा के इस संदर्भ में ताजा लिखे लेख का है जिसमे उसने भी लगभग अरुण जेटली की राय का लगभग समर्थन किया है। इस पूरी पृष्ठ भूमि में इस सवाल की एक विस्तृत छानबीन की जरूरत है।
संविधान की व्यवस्था --
                                       संविधान में राज्य सभा को कुछ मामलों में लोकसभा के बराबर के अधिकार के अधिकार दिए गए हैं और कुछ मामलों में लोकसभा को अबाधित अधिकार दिए गए हैं। बजट को पास करवाने के लिए और किसी भी प्रकार के मनी बिल के संदर्भ में किसी भी बिल को राज्य सभा में पास करवाने की कोई जरूरत नही है। इस मामले में लोकसभा को पूर्ण रूप से अकेले ही अधिकृत किया गया है। लेकिन हमारे संविधान के संघीय ढांचे को देखते हुए संविधान संशोधन के मामले में और दूसरे मामलों में राज्य सभा को वो सभी अधिकार हासिल हैं जो लोकसभा को हासिल हैं। राज्य सभा राज्यों द्वारा चुने गए सदस्यों  सदन है और लगभग राज्यों की काउन्सिल की तरह काम करती है। इसलिए संविधान के  संघीय ढांचे को बनाये रखने के लिए उसे ये अधिकार दिए गए हैं। राज्य सभा के लोग कोई बिना चुनाव के आये हुए या नामित किये हुए नही हैं। फर्क केवल इतना है की ये लोग लोकसभा सदस्यों की तरह सीधे चुन कर आने की बजाए राज्य विधान सभाओं में लोगों द्वारा चुने गए, लोगों द्वारा चुने गए हैं।
सीधे चुनाव का सवाल -
                                       ये बात की राज्य सभा के सदस्य लोगों का सीधा प्रतिनिधित्व नही करते, सीधे रूप में सही होने के बावजूद दूसरे रूप में सही नही है। राज्य सभा के सदस्य विधान सभाओं के जिन सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं वो सदस्य भी लोगों द्वारा सीधे चुने जाते हैं। लेकिन राज्य सभा का चुनाव लोकसभा द्वारा एकसाथ नही होता है बल्कि हर दो साल बाद इसके एक तिहाई सदस्यों का चुनाव होता है। इसलिए अगर इन दो सालों  में किसी विधान सभा के चुनाव हुए हों ओर उसमे पार्टियों की स्थिति में बदलाव आया हो तो उसका सीधा असर इस चुनाव पर पड़ता है और नए सदस्यों के हिसाब से लोग चुने जाते हैं। लोकसभा के चुनाव में एक साथ सभी सदस्य सीधे लोगों द्वारा चुने जाते हैं इसलिए उसे सीधा लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाला सदन माना जाता है। इसलिए ये मांग उठाई जा रही है की उसे अबाधित अधिकार दिए जाएँ। लेकिन इसमें इस बात का खतरा भी रहता है की लोकसभा चुनाव में लोग किसी तात्कालिक घटना, सहानुभूति के आधार और किसी लहर के चलते भी चुन कर आ सकते हैं। और इस तरह चुन कर आये हुए लोग जल्दबाजी में संविधान में कोई ऐसा परिवर्तन या संशोधन कर सकते हैं जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। संविधान निर्माताओं के ध्यान में ये बात भी रही होगी और इसीलिए उन्होंने कानून बनाने और संविधान संशोधन करने जैसे मामलों में राज्य सभा को भी बराबर के अधिकार दिए ताकि इस तरह की चीजों को रोका जा सके।
लोकसभा और लोक-प्रतिनिधित्व ----
                                                            हमारे देश में लोकसभा का चुनाव जिस तरीके से होता है उसमे ये कतई जरूरी नही है की लोकसभा के चुने हुए सदस्य लोगों के बहुमत का प्रतिनिधित्व करते हों। हमारी चुनाव प्रणाली के अनुसार तो 25 % वोट लेने वाली पार्टी भी लोकसभा में बहुमत प्राप्त कर सकती है। उसके आलावा कोई ऐसी पार्टी भी सरकार में पहुंच सकती है जो देश के किसी एक क्षेत्र जैसे उत्तर या दक्षिण में ही प्रभाव रखती हो। इस हालात में केवल लोकसभा को सारी शक्तियां देना देश के संघीय ढांचे और बहुमत की राय के खिलाफ जा सकती हैं। इसलिए ऐसे मामलों में दोनों सदनों को समान अधिकार एक दूरदर्शी फैसला था।
लोकमहत्त्व के काम और राज्य सभा ---
                                                               दूसरा सवाल ये है की क्या राज्य सभा सचमुच में लोक महत्त्व के बिलों को रोकने का साधन बन गयी है ? अभी जो पार्टी सत्ता में है वो अपना प्रो-कॉर्पोरेट एजेंडा लागू करने की जल्दबाजी में है। इसलिए वो कुछ ऐसे संशोधन करना चाहती है जिन पर देश में गंभीर बहस है और देश का एक बड़ा वर्ग उनका विरोध कर रहा है। राज्य सभा पहले भी संविधान संशोधनों को मंजूरी देती रही है और ऐसा नही है की उसने सभी बिलों रोक कर रक्खा हुआ है। लेकिन अपने एजेंडे को लागु ना कर पाने की खीज में सरकार की तरफ से ऐसे बयान आ रहे हैं। इसलिए संविधान निर्माताओं की समझ और राज्य सभा को मिले अधिकारों के महत्त्व को परोक्ष या अपरोक्ष चुनाव के नाम पर कम नही किया जाना चाहिए।

Thursday, November 26, 2015

संविधान दिवस, बाबा साहेब अम्बेडकर और राजनाथ सिंह

आज संसद में बाबा साहेब अम्बेडकर की 125वीं जयंती पर संविधान दिवस मनाये जाने के अवसर पर संसद में इस विषय पर बोलते हुए गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा की भारत में कई बार और बार-बार अपमान सहन करने के बावजूद बाबा साहेब ने कभी देश छोड़ने की बात नही की। राजनाथ सिंह के दिमाग में उस समय भी आमिर खान छाये हुए थे।
            लेकिन राजनाथ सिंह ने  एक बात नही बताई की ब्राह्मण वादी हिंदू धर्म से अपमानित होकर और ये समझ लेने के बाद की हिन्दू धर्म में रहते हुए किसी भी दलित वर्ग के व्यक्ति के लिए बराबरी का सम्मान प्राप्त करना सम्भव नही है। और इसी कारण से बाबा साहेब अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म को त्याग कर बौद्ध धर्म अपना लिया था और समग्र दलित समाज से हिन्दू धर्म का त्याग करने की सलाह दी थी। ये ब्राह्मण वादी हिन्दू धर्म की असहिष्णुता ही थी जिसने बाबा साहेब अम्बेडकर को हिन्दू धर्म छोड़ने के लिए मजबूर किया। ये  वही लोग थे जो बाकि किसी को इस देश का नागरिक मानने को भी तैयार नही थे और आज भी वही लोग हैं जो बाकि किसी को देशभक्त मानना तो दूर, उनको इस देश का नागरिक होने का दर्जा भी देने को तैयार नही हैं।
             जब असहिष्णुता की बात होती है तो सभी असहिष्णु तत्व इस बात को इस तरह प्रचारित करते हैं जैसे ये पुरे देश के और खासकर सभी हिन्दुओं के असहिष्णु होने की बात हो। इस मामले पर पुरस्कार लौटाने वाले ज्यादातर लोग हिन्दू ही हैं। और इस असहनशीलता का शिकार होकर जान खो देने वाले दाभोलकर, कलबुर्गी और गोविन्द पंसारे तीनो हिन्दू ही थे। ये लड़ाई हिन्दू और गैर हिन्दू की नही है और ना ही भारतीय और गैर भारतीय की है। ये लड़ाई समाज को बाँटने वाले और देश को एक धर्म आधारित राज्य में बदल देने की कोशिश करने वालों और उसका विरोध करने वालों के बीच है। लेकिन इसमें दुर्भाग्य की बात ये है की इसमें ऐसे लोग भी जो हमेशा से सहिष्णु रहे हैं और इस तरह के विवाद के खिलाफ हैं वो भी दुष्प्रचार के शिकार हो जाते हैं।

Wednesday, November 25, 2015

GST Bill पर सरकार का मिथ्या आशावाद

GST Bill पर सरकार और विपक्ष के बीच का गतिरोध कोई नया नही है। इस बिल पर सरकार और विपक्ष के बीच गंभीर मतभेद हैं। सरकार पहले दिन से इन मतभेदों को छिपाने और इस पर लगभग आम सहमति का दावा करती रही है। लेकिन इसके बावजूद वो इसको पास करवाने में नाकामयाब रही है। सरकार इसके लिए चाहे कितना ही विपक्ष को विकास विरोधी बताये और कोसे, लेकिन उससे ये बात खत्म नही हो जाती की वो इसे पास नही करवा पा रही है।
             अब जब शीतकालीन सत्र शुरू होने जा रहा है तो सरकार का ये बयान की उसे इस सत्र में इसके पास होने की पूरी उम्मीद है केवल उसके मिथ्या आशावाद या फिर लोगों को गुमराह करने की कोशिश ही है। कारण ये है की इस दौरान सरकार ने ऐसा कुछ नही किया है जिससे ये संकेत मिलता हो की इस पर सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद कम हुए हैं। उल्टा शीतकालीन सत्र से पहले बीजेपी के कुछ नेताओं द्वारा राहुल गांधी और राबर्ट वाड्रा पर तेजी से व्यक्तिगत हमले हुए हैं जिससे सरकार और विपक्ष के बीच कड़वाहट कम होने की बजाए बढ़ी ही है। सीपीआई [एम ] नेता सीताराम येचुरी ने तो बिलकुल साफ साफ कहा है की शीतकालीन सत्र में इस बिल का पास ना होना सरकार द्वारा होमवर्क की कमी का नतीजा होगा। येचुरी ने कहा की सरकार ने इस पर बात करने के लिए एक सर्वदलीय बैठक तक नही बुलाई।
             अब सत्र से ठीक पहले वित्तमंत्री का ये कहना की वो इस मामले पर कांग्रेस से बातचीत को तैयार हैं की ट्यून भी कुछ ऐसी है जैसे ये कोई कांग्रेस की जिम्मेदारी है और सरकार उसके लिए कोई रियायत दे रही है। कुछ लोगों का ये कहना की बीजेपी अभी भी ये नही समझ पाई है की वो अब विपक्ष में नही बल्कि सत्ता में है, ठीक ही लगता है। इसलिए इस बिल के इस सत्र में पारित होने की आशा करना विलासिता ही होगी।

-----इस विषय पर दूसरे लेख ------

GST बिल घोर जनविरोधी, भयंकर महंगाई बढ़ाने वाला और लघु उद्योगों की मौत का फरमान है। 

GST बिल अलोकतांत्रिक,संघीय प्रणाली के खिलाफ और अमीरों और बड़ी कम्पनियों के फायदे में है।

 

कर्मचारी भविष्य-निधि संगठन [ EPFO ] के ETF में निवेश के कम मुनाफे पर चिंता

सरकार के शेयर मार्केट में निवेश को बढ़ावा देने की कोशिश में कर्मचारी भविष्य-निधि संगठन [EPFO ] के धन का इसमें निवेश करने के फैसले के बाद इसके CBT ने मार्च 2016 तक शेयर मार्केट में 6000 करोड़ के निवेश का फैसला लिया। ये निवेश केवल ETF यानि एक्सचेंज ट्रेडेड फण्ड के माध्यम से करने का फैसला हुआ। इसके बाद ऑगस्त से लेकर अब तक इसमें 2322 करोड़ का निवेश किया जा चूका है। इस फैसले के समर्थन में सरकार और शेयर बाजार के समर्थको का तर्क था की भविष्य-निधि संगठन को अपने निवेश के लिए ज्यादा मुनाफा देने वाले स्रोतों की खोज करनी चाहिए। केवल तयशुदा ब्याज में निवेश ज्यादा फायदेमंद नही है। लेकिन सभी केंद्रीय ट्रैड यूनियनों ने इसका ये कहकर कड़ा विरोध किया था की शेयर बाजार का निवेश बहुत जोखिम भरा होता है और कर्मचारियों की बचत का पैसा इस तरह के जोखिम वाले जगहों में निवेश नही किया जाना चाहिए। परन्तु उस समय सरकार और बाजार समर्थक इसमें ज्यादा मुनाफा होने का तर्क दे रहे थे।
                  अब इसके सेंट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज की मीटिंग में जब इस निवेश के मुनाफे [ Return ] की गणना की गयी तो ये सालाना 1 . 52 % हुआ। जिससे इसका विरोध करने वालों की आशंका सही साबित हुई। अब बाजार समर्थक ये तर्क दे रहे हैं की इतने कम समय में शेयर बाजार के रिटर्न की समीक्षा सही नही है और की शेयर बाजार हमेशा लम्बी अवधि में ज्यादा रिटर्न देता है। लेकिन अब इसके बोर्ड की अगली मीटिंग में इस पर पुनर्विचार होगा।
                     इस पुनर्विचार में इस निवेश को रोके जाने या पलटे जाने की संभावना से इसके केंद्रीय कमिशनर ने इंकार किया है  इतना तो जरूर है की इसका विरोध करने वाले कर्मचारी यूनियनों के सदस्यों का पक्ष मजबूत होगा। CITU के नेता और इसके सेंट्रल बोर्ड के सदस्य ए, के, पद्मनाभम ने कहा है की शेयर मार्केट में निवेश से पहले सरकार इसके एक न्यूनतम रिटर्न की गारंटी दे। वरना कर्मचारियों की जिंदगी भर की बचत का पैसा शेयर बाजार में लगाने का वो सख्ती से विरोध करेंगे।
                   इन हालात को देखते हुए 6 दिसंबर को होने वाली इसके सेंट्रल बोर्ड की मीटिंग पर सबकी नजर रहेगी।

Tuesday, November 24, 2015

Comment -- रूस का विमान गिराने पर तुर्की को अमेरिका और नाटो का समर्थन

खबरी -- अमेरिका और नाटो ने रूस का विमान गिराये जाने की घटना पर तुर्की का समर्थन किया है।

गप्पी -- रूस ने विमान गिराने के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में इसे आतंकवादियों के सहयोगियों द्वारा पीठ में छुरा घोंपने की घटना बताया था। रूस और दुनिया के बहुत से लोग ये मानते हैं की ISIS की स्थापना और उसका सहयोग अमेरिका और उसके समर्थक कर रहे हैं। कई चीजों और घटनाओं के द्वारा ये बात साफ हुई है। लेकिन ये देश खुद अपने देश की जनता और शेष विश्व के सामने इससे इंकार करती रही हैं। अभी दो दिन पहले सयुंक्त राष्ट्र ने एक प्रस्ताव पारित करके ISIS के खिलाफ साझी कारवाही का आग्रह किया है। उसके बावजूद ये घटना कुछ दूसरे ही संकेत देती है।
                 अगर हम इस घटना पर सरसरी नजर भी डालें तो इसके दूसरे उद्देश्य साफ हो जाते हैं। रूस का विमान जब हमले का शिकार हुआ तब वो सीरिया की सीमा में था। उसका मलबा और उसके दोनों पायलट सीरिया के इलाके में गिरे। जिनमे एक पायलट के मृत शरीर पर सीरिया के विद्रोहियों को नाचते हुए दिखाया गया है। खुद तुर्की ने इस पर जो बयान जारी किया है उसमे उसने पांच मिनट में दस बार चेतावनी देने की बात कही है। इसका मतलब ये है की तुर्की ने चेतावनी देने के पांच मिनट के अंदर ही विमान को मार गिराया। रूस सीरिया में ISIS के खिलाफ कार्यवाही कर रहा है और अगर किसी कारणवश ये मान भी लिया जाये की उसके विमान द्वारा तुर्की की सीमा का उल्ल्ंघन हो गया तो इसमें ऐसी कौनसी आफत आ गयी थी की विमान गिराने जैसी कार्यवाही की जरूरत पड़ी। असल कारण ये है की रूस द्वारा सीरिया में असद सरकार को समर्थन इनको हजम नही हो रहा है और इन्हे लगता है की रूस की कार्यवाही के जारी रहते सीरिया के असद विरोधी दलों को कामयाब नही किया जा सकता। अपने बयान में अमेरिका ने कहा है की तुर्की को अपनी वायुसीमा की रक्षा का हक है और रूस अगर केवल ISIS के खिलाफ की कार्यवाही पर ध्यान दे तो टकराव की संभावना कम होगी। ये बयान अपने आप में अमेरिकी और उसके साथी देशो की नीति को स्पष्ट करते हैं।
                      इसमें एक बड़ा सवाल ये खड़ा होता है की आतंकवाद पर अमेरिका हमेशा दोहरे मापदंड क्यों अपनाता है। उसके तर्क हर बार बदल जाते हैं। जैसे -
१.   अमेरिका जब अफगानिस्तान में कार्यवाही करते हुए पाकिस्तान में घुस कर हमला करता है या इस्राइल जब लेबनान और सीरिया में हमला करते हैं तो अमेरिका कहता है की उसे आतंकवादियों का पीछा करने और मार गिराने का हक है।
२.   अमेरिका जब असद सरकार के खिलाफ लड़ रहे विद्रोहियों को समर्थन देता है तो कहता है की वो सीरिया में लोकतंत्र की स्थापना में मदद कर रहा है। और जब वो यमन के भगोड़े राष्ट्रपति को समर्थन देकर यमन के विरोधी दलों पर हमला करता है तो कहता है की एक legitimate सरकार को समर्थन दे रहा है।
३.   जब अमेरिका के ड्रोन पाकिस्तान में घुस कर हमला करते हैं और उसमे पाकिस्तान के निर्दोष नागरिक मारे जाते हैं तो अमेरिका इसे " गलती से हुआ " हमला बताता है और इस बात पर जोर देता है की आतंकवादियों के खिलाफ कार्यवाही में इस तरह की एकाध भूल को नजरअंदाज कर दिया जाना चाहिए। और केवल पांच मिनट में रूस के विमान गिराने की तुर्की कार्यवाही को उसके वायुसीमा की रक्षा का हक करार देता है।
       इन सब घटनाओं से एक बार फिर ये साबित होता है की अमेरिका केवल अपने हितों पर ध्यान देता है और उसका कोई इरादा नही है आतंकवाद के खिलाफ किसी निरपेक्ष कार्यवाही में शामिल होने का। आतंक के सवाल पर दुनिया के नजरिये में दरार बार बार सामने आती है और अमेरिका और उसके सहयोगी केवल अपने आर्थिक और सामरिक हितों के अनुसार सोचते हैं। फिर भले ही खुद उनके नागरिकों को भी इसकी कीमत क्यों ना चुकानी पड़े। आतंक के सवाल पर अमेरिका की भारत और पाकिस्तान नीति में दशकों से ये बात सामने आ चुकी है।

Comment -- आमिर खान का बयान, कश्मीर और भक्तगण

देश में बढ़ती हुई असहिष्णुता के खिलाफ आमिर खान द्वारा दिए गए बयान पर जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं वो अपेक्षित थी। आमिर खान ने ये बयान रामनाथ गोयनका अवार्ड दिए जाने के समय हुए समारोह में दिया और उस वक्त सरकार के कुछ बड़े मंत्री और नेता, जैसे की अरुण जेटली, रविशंकर प्रशाद और संबित पात्रा वहां मौजूद थे। जाहिर है की इस पर प्रतिक्रियाएं भी आनी ही थी। लेकिन इन प्रतिक्रियाओं में एक अजीब किस्म की झल्लाहट झलक रही थी।
               इस पर प्रतिक्रिया करते हुए अनुपम खेर ने कहा की अतुल्य भारत कब से असहनशील हो गया ? संघी कलाकारों  यही मुसीबत है की वो अपने आप को ही भारत समझते हैं। आमिर खान का बयान ना तो भारत के खिलाफ था और ना ही हिन्दुओं के खिलाफ था। ये बयान केवल और केवल उन संघी गुंडा गिरोहों के खिलाफ था जो देश का माहौल बिगाड़ने  कोशिश कर रहे हैं। लेकिन हमेशा की तरह संघ से जुड़े लोग विशाल हिन्दू बहुमत  पीछे छिपने  कोशिश करते हैं और ऐसा माहोल बनाने की कोशिश करते हैं जैसे वो सारे हिन्दू समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। अगर ऐसा होता तो  आपका बिहार में ये हाल होता ? एक दूसरे प्रवक्ता हैं अशोक पंडित, जो हर जगह घुसने  कोशिश करते हैं और बहस पर कब्जा करने की कोशिश करते हैं, और जिनके बारे में संघ के ही एक दूसरे प्रशंसक पहलाज निहलानी ने आज ही फर्जीवाड़ा करने का आरोप लगाया है उन्होंने भी ऐसी ही हिंदू प्रतिनिधि की मुद्रा अपनाई है। एक बयान परेश रावल का भी आया है जिसमे उसने कहा है की किसी भी देशभक्त को मुसीबत के समय अपनी मातृभूमि को छोड़कर नही भागना चाहिए। उन्होंने ये बयान शायद कश्मीर के संदर्भ में अशोक पंडित और अनुपम खेर के लिए दिया है जो मुसीबत के समय कश्मीर से भाग गए अब हररोज टीवी  कश्मीर-कश्मीर चिल्लाते रहते हैं। मैं कश्मीर और कश्मीरी पंडितों से जुड़े कुछ सवाल इनसे पूछना चाहता हूँ।
१.  क्या कश्मीर में अब एक भी पंडित नही रहता ? और अगर अब भी कश्मीर में पंडित रहते हैं तो वो क्यों भाग आये ?
२.  अब तो कश्मीर में और केंद्र में दोनों जगह आपकी सरकार है, फिर आप वापिस क्यों नही जा रहे ?
३.   अगर अब भी कश्मीर में हालत सामान्य नही है तो आपकी सरकार क्या कर रही है ?
४.   अगर आपको लगता है की कश्मीर के हालात पर सरकार का ज्यादा काबू नही है तो आप पिछली सरकार को क्यों कोसते थे ? क्या उसके पीछे राजनितिक कारण थे ?
५.   आपकी सरकार कश्मीर में लहराते ISIS के झंडों और उन्हें लहराने वालों पर कार्यवाही नही कर पा रही है या करना नही चाहती ?
६.   अगर आपकी सरकार कार्यवाही कर नही पा रही है तो उसका कारण बताइये। और अगर करना नही चाहती तो उसका कारण बताइये। अब ये मत कहना की ये राष्ट्रिय सुरक्षा का मामला है और इस पर बहस नही की जा सकती क्योंकि इस मांग पर आपने हजारों टीवी कार्यक्रम किये हैं।
७.   आपकी सरकार के आने के बाद आपने शरणार्थी कैम्पों में रहने वाले कश्मीरी पंडितों के लिए कौन-कौन सी नई सुविधाएँ लागु की हैं ?
           अगर आपके पास इन सब सवालों का कोई पुख्ता जवाब नही है और अगर आप इन पंडितों को घाटी में वापिस नही बसा पा रहे हैं तो टीवी बहसों में भौकना बंद कीजिये।
                      मेरा एक सवाल और सलाह भक्तों के लिए भी है। वो अपने आप को इस देश और इस देश के हिन्दुओं का ठेकेदार ना समझें। अभी इसका ठेका उन्हें नही मिला है। इस देश में रहने वाला हर नागरिक अपनी समस्याओं और परेशानियों पर अपनी राय रखने का अधिकार रखता है और सरकार से उस पर जवाब और कार्यवाही की उम्मीद भी रखता है और ये अधिकार उसे देश के संविधान ने दिया है। और ये उस संविधान ने दिया है जिसे बनाने में और लागु करने में आपके पूर्वजों की कोई भूमिका नही थी।

Friday, November 20, 2015

Comment -- मोदी जी की भारत यात्रा, चीन की गैर क़ानूनी बैंकिंग व्यवहार की खबर और UP में गाय

खबरी -- मोदी जी फिर विदेश यात्रा पर। 

गप्पी -- हाँ ! मोदी जी की भारत यात्रा आज समाप्त  गयी।  अपनी अगली भारत यात्रा के दौरान उम्मीद है की मोदी जी भारत की संसद को सम्बोधित करेंगे।

खबरी -- चीन में बड़े पैमाने की गैर क़ानूनी विदेशी मुद्रा बैंकिंग पकड़ी गयी है।

गप्पी -- चीन सरकार ने USD 64 बिलियन के विदेशी मुद्रा देश से बाहर भेजे जाने को पकड़ने की घोषणा की है। अब तक चीन में USD 126 बिलियन के गैर क़ानूनी बैंक व्यवहार पकड़ने और 370 लोगों पर कार्यवाही करने की खबर दी है। चीन जैसे देश, जहां इतने सख्त कानून और सजाएं हैं, वहां अगर इतने बड़े पैमाने पर काला धन विदेश भेजा जा रहा है तो हमारे देश की हालत का तो केवल अनुमान ही लगाया जा सकता  है। 

खबरी -- अब मुलायम सिंह ने एक समारोह में गाय पालने की बात कही है।

गप्पी -- बिहार चुनाव के बाद गाय के पास कोई काम नही था, सो वह पड़ोस के उत्तर प्रदेश में चली गयी। मुलायम सिंह ने सोचा होगा की जब तक बीजेपी इस पर कब्जा जमाये, इसे अपने आँगन में बांध लिया जाये।

Thursday, November 19, 2015

COMMENT ON NEWS -- ओबामा, मोदी और मुलायम सिंह यादव

खबरी -- ओबामा ने कहा है की रूस को सीरिया में असद और legitimate सरकार में से एक को चुनना होगा। 

गप्पी -- सीरिया में राष्ट्रपति असद की सरकार के खिलाफ लड़ने वाले अमेरिका और पश्चिमी देशों से समर्थन प्राप्त विद्रोही वहां चुनाव में भाग लेने से इंकार करते हैं। उनका कहना है की बिना किसी चुनाव के सीरिया की सरकार को उनके हवाले कर दिया जाये। क्योंकि विद्रोही और अमेरिका दोनों जानते हैं की उन्हें लोगों का समर्थन प्राप्त नही है। अमेरिका को सीरिया में भी लीबिया, इराक और यमन की तरह एक Legitimate सरकार चाहिए।

खबरी -- उत्तरप्रदेश में भी बिहार की तरह महागठबंधन की बात चल रही है।

गप्पी -- लेकिन ये गठबंधन किस-किसके बीच हो सकता है अभी इस पर स्थिति साफ नही है। बिहार चुनाव में मुलायम सिंह द्वारा बीजेपी समर्थक स्टैंड लिए जाने के बाद दादरी की घटना पर मुलायम सिंह ने प्रेस कांफ्रेंस करके कहा था की उनकी सरकार ने तीन ऐसे लोगों की पहचान कर ली है जो दादरी और मुजफ्फर नगर , दोनों जगह दंगे करवाने के लिए जिम्मेदार हैं, और इन लोगों पर कार्यवाही की जाएगी भले ही उनकी सरकार क्यों ना चली जाये। उसके बाद हमेशा की तरह मुलायम सिंह यादव चददर तान कर सो गए और लोग अभी भी कार्यवाही का इंतजार कर रहे हैं। इसलिए लगातार खत्म होती साख के बाद मुलायम के नेतृत्व में कोई गठबंधन बन सकता है इसमें लोगों को शक है।

खबरी -- प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है की विविधता हमारी ताकत है। 

गप्पी -- मोदी जी कई बार इस तरह के बयान देते रहते हैं जो उनकी पार्टी और आरएसएस की गतिविधियों से मेल नही खाते। अगर विविधता को आप ताकत मानते हैं तो इसे खत्म करने के प्रयास क्यों कर रहे हैं। मोदी जी की साख भी केवल बयानों से बहाल होने वाली नही है। उन्हें भी इसके लिए कार्यवाही करनी होगी।

Wednesday, November 18, 2015

OPINION --" कांग्रेस मुक्त भारत " की इच्छा और संसदीय गतिरोध

लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी एक नारा बड़े जोर-शोर से लगाती थी। ये नारा था " कांग्रेस मुक्त भारत " का। पिछली कांग्रेस सरकार की घटती हुई या यूँ कहिये की लगभग खत्म हो चुकी लोकप्रियता के चलते किसी को ये नारा अटपटा नही लगा। लेकिन अब जब इस सरकार का एक तिहाई समय गुजर चूका है और लोग अभी उसके वायदों के पुरे होने का इंतजार ही कर रहे हैं, ऐसे समय में लोगों को ये नारा अच्छा नही लग रहा है।
                लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के इवेंट मैनेजमेंट के करिश्मे को लोगों ने कामयाब होते देखा। इससे पहले भी गुजरात के चुनावों में बीजेपी और नरेंद्र मोदी इस इवेंट मैनेजमेंट का इस्तेमाल करते रहे हैं। हर जीते जाने वाले चुनाव के बाद बीजेपी ने जैसे ये मान लिया की लोकतंत्र केवल इवेंट मैनेजमेंट के द्वारा चलाया जा सकता है। हमारा मीडिया, जो इस मैनेजमेंट का सीधा बनिफिसयरी था, वो भी सारी चीजों को उसी तरह पेश कर रहा था। लेकिन दिल्ली और बिहार के चुनाव परिणामो ने इस पुरे मिथक की हवा निकाल दी।
                पिछले लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के खिलाफ लोगों और कॉर्पोरेट सेक्टर की जो नाराजगी थी उसके बाद बीजेपी को उसका फायदा मिला। लेकिन बीजेपी ने ये समझ लिया की वो सचमुच में कांग्रेस मुक्त भारत की तरफ बढ़ सकती है। सरकार बनने के बाद भी बीजेपी की तरफ से कांग्रेस और खासकर गांधी परिवार पर उसके व्यक्तिगत हमले जारी रहे। बीजेपी ने चाहे राहुल गांधी की व्यक्तिगत इमेज हो या राबर्ट वाड्रा हो कोई मौका हमला करने का नही छोड़ा।
                 इसके बाद बारी आई संसद में सरकारी कामकाज की। पहले ही सत्र में संसद ने काम के नए रिकार्ड स्थापित किये। सरकार ने कई ऐसे बिल पास करवा लिए जिनका खुद उन्होंने विपक्ष में रहते हुए विरोध किया था और पॉलिसी पैरालिसिस का इल्जाम सरकार पर लगाया था। इन बिलों को पास करवाने में कांग्रेस ने सक्रिय योगदान दिया। लेकिन सरकार ने इसे भी उसकी खुद की उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया। बीजेपी ने ऐसा आभास देने की कोशिश की जैसे पिछली सरकार सचमुच निकम्मी थी और वो बहुत कार्यक्षम सरकार है। बीजेपी ने विपक्ष को धन्यवाद देने की सामान्य परम्परा का भी निर्वहन नही किया।
                उसके बाद विवादास्पद भूमि बिल आया। जिसका पुरे देश में किसान संगठनो और विपक्षी दलों ने भारी विरोध किया। लेकिन बीजेपी को लगता था की वो विपक्ष को विकास विरोधी चित्रित करके उसे इस बिल का समर्थन करने को मजबूर कर देगी। और बीजेपी ने यही तरीका अपनाया। इसके लिए उसने चार बार इसके किये अध्यादेश जारी किया। विपक्ष के खिलाफ विकास को रोकने का इल्जाम पुरे जोर-शोर से लगाया। लेकिन चूँकि लोकतंत्र केवल इवेंट मैनेजमेंट नही होता, बीजेपी इसे पास करवाने में विफल हो गयी। उसने शर्मिंदगी के साथ इस बिल को वापिस ले लिया।
                   उसके बाद आया GST बिल का मुद्दा। इस पर भी कांग्रेस ने विरोध का रास्ता अपना लिया। बीजेपी ने फिर वही विकास विरोध की बातें करनी शुरू की और कांग्रेस के खिलाफ अपने हमले जारी रखे। लिहाजा वो इस बिल को पास कराना तो दूर संसद को भी नही चला पाई। उसने संसद के गतिरोध के लिए विपक्ष को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की, लेकिन लोगों को बीजेपी द्वारा संसद को बाधित करने के वाक़ये अभी भी याद थे। इसलिए लोगों ने इस मामले पर सरकार की राय को कोई महत्त्व नही दिया, ये बिहार चुनावों से भी साफ हो गया।
                 अब फिर संसद का सत्र सामने है। मीडिया और लोगों का एक हिस्सा इसको भी गतिरोध की भेंट चढ़ जाने का अंदेशा प्रकट कर रहे हैं। कॉर्पोरेट सेक्टर इस सत्र पर आँखे गड़ाए हुए है। लेकिन इससे पहले एक बार फिर राबर्ट वाड्रा और कांग्रेस पर व्यक्तिगत हमलों की बौछार शुरू हो गयी है। बीजेपी अब भी समझती है की वो इस तरह डरा धमका कर अपना काम निकाल लेगी। लेकिन उसकी इस रणनीति के कारण एकबार फिर ये सत्र भी गतिरोध का शिकार होता नजर आ रहा है।
                  अब समय आ गया है की बीजेपी आत्म-मुग्धता की स्थिति से बाहर निकले और विपक्ष के साथ बातचीत और सहयोग का रवैया अपनाये। उसकी ये धारणा गलत है की विरोध करने पर विपक्ष या कांग्रेस बदनाम होगी, उसे ये समझना चाहिए की काम होने या ना होने की जिम्मेदारी उसकी है और इसका जवाब भी उसको ही देना है। लोगों को कांग्रेस और बीजेपी की आपसी राजनीती से कोई मतलब नही है। अगर सरकार काम नही कर रही है तो जिम्मेदारी उसकी ही होगी।

Tuesday, November 17, 2015

Comment--- बच्चों को कटटरता से बचाने का सवाल

खबरी -- ओबामा ने बच्चों को कटटरता से बचाने का बयान दिया है।

गप्पी -- ओबामा ने बच्चों को कटटरता से बचाने का बयान खासकर मुस्लिमो के संदर्भ में दिया है जिस पर पूरी दुनिया में एक बहस छिड़ गयी है। बहुत से लोग इसे अमेरिका का मुस्लिमों के प्रति पूर्वाग्रह बता रहे हैं जो खुलकर सामने आ गया है।
                 फिर भी ये बात अपनी जगह सही है की बच्चों को कटटरता से बचाया जाना चाहिए। ये कटटरता कई प्रकार की होती है और इन सभी प्रकारों की कटटरता को इसमें शामिल किये बिना न तो इसका कोई हल निकल सकता है और ना ही इसके लिए कोई विश्व स्तरीय जनमत बनाया जा सकता है। जो बच्चे कुछ कटटर देशों के हमलों के शिकार होते हैं उनको इसमें शामिल किए बिना इसका कोई मतलब नही रह जाता है।
armed childs from isis
                बहुत से लोग ये भी याद दिलाते हैं की इराक पर अमेरिकी पाबंदियों के चलते दवाइयों के आभाव में करीब दस लाख बच्चे मारे गए थे और अमेरिका समर्थित इसराइल के हमलों में हर रोज गाजा में कितने ही बच्चे मारे जा रहे हैं उनके बारे में अमेरिका की क्या राय है ये भी बहुत मायने रखता है।
dead body of a child and a person running with a injurd child
                 इसके अलावा गैर-मुस्लिम धर्मो के संगठनो द्वारा बच्चों में डाली जा रही कटटरता के बारे में भी दुनिया को उसी तरह का रवैया अपनाना पड़ेगा। जैसे भारत में आरएसएस द्वारा बच्चों को दी जाने वाली हथियारों की ट्रेनिंग के बारे में। वरना अगर सलेक्टिव रवैया अपनाया जायेगा तो इसकी जन भागीदारी प्रभावित होगी और इसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लग जायेगा।
girls with guns and flags of a rss organization

Saturday, November 14, 2015

Comment -- फ़्रांस पर आतंकी हमला और ISIS के खिलाफ जवाबी कार्यवाही का सवाल

ISIS ने फ़्रांस में सीरियल बम ब्लास्ट करके लगभग 150 लोगों को मार डाला। इस बर्बर और कायरता पूर्ण हमले की पुरे विश्व ने निंदा की और फ़्रांस के साथ एकजुटता का इजहार किया। इस हमले के बाद फ़्रांस के राष्ट्रपति ने इस हमले का कड़ा जवाब देने की घोषणा की। लेकिन पश्चिमी देशों की राजनीती को देखते हुए इस पर कुछ सवाल खड़े होते हैं।
१.  अमेरिका सीरिया में बसर-अल-असद की सरकार को हटाने के लिए ISIS को लगातार मदद देता रहा है। उसे मध्य-पूर्व में अपनी कब्जावर राजनीती और उद्देश्यों के लिए ISIS की लगातार जरूरत पड़ती है।
२.   यूरोपीय देशों को भी असद सरकार को हटाने के लिए ISIS जरूरी नजर आता है और वो इसके खिलाफ रुसी हमले का विरोध कर रहे हैं। पुतिन द्वारा सीरिया में ISIS के खिलाफ कार्यवाही का सबसे ज्यादा विरोध अमेरिका और फ़्रांस ने ही किया था।
३.  ईरान और सीरिया गठबंधन को कमजोर करने और लेबनान में हिजबुल्ला को रोकने के लिए इसराइल भी ISIS को सहयोग करता रहा है और वो मध्य-पूर्व में एक बड़ी और निरंकुश सैन्य ताकत है।
४.  सऊदी अरब भी शिया-सुन्नी अंतर्विरोध के चलते ISIS की मदद कर रहा है।
              इस पूरी गोलबंदी के बाद ISIS के खिलाफ कोई प्रभावी कार्यवाही ये लोग करेंगे इसका भरोसा किसी को नही हो रहा है। अमेरिका और यूरोपीय देश जब भी ISIS के खिलाफ कार्यवाही की बात करते हैं तो ऐसा लगता है जैसे कोई बाप अपने बिगड़ैल बच्चे को धमका रहा हो।

Friday, November 13, 2015

NEWS -- नितेश राणे अब भी शिव सैनिक ही हैं ?

खबरी -- नितेश राणे ने गिरीश कर्नाड के बयान का विरोध करते हुए उनसे माफ़ी की मांग की है।

गप्पी -- मुश्किल यही है की कांग्रेस में भी ऐसे लोगों की बड़ी तादाद है जो इलाका, धर्म और सम्प्रदाय की राजनीती करते हैं।  नितेश राणे के पिता नारायण राणे कभी शिवसेना के बड़े नेता होते थे जो बाद में कांग्रेस  में शामिल हो गए। लेकिन उनकी सोच, राजनीती और तोर तरीके शिवसेना से मिलते हैं। जब पूरा देश असहिष्णुता के खिलाफ लड़ रहा है और हिन्दू संगठन कर्नाटक में गिरीश कर्नाड को जान से मारने की धमकी दे रहे हैं, उसी समय नितेश राणे का गिरीश कर्नाड पर हमला फिर से ये साबित करता है की इस लड़ाई को कांग्रेस की  अगुवाई में नही लड़ा जा सकता। हालाँकि कांग्रेस में नितेश राणे कोई नेता नही हैं फिर भी इस लड़ाई में एक असमंजस तो पैदा होती ही है।

Monday, November 9, 2015

बिहार चुनाव के एग्जिट पोल ( EXIT -POLL ) इतने गलत साबित क्यों हुए।

बिहार चुनाव के एग्जिट पोल आने शुरू हुए, और उनमे लगभग सभी कांटे की टककर दिखाने लगे और कुछ तो बीजेपी गठबंधन को आगे दिखाने लगे तो सबसे ज्यादा असहमत उन चैनलों के एंकर ही लग रहे थे। वो एग्जिट पोल प्रसारित जरूर कर रहे थे  परन्तु उनके चेहरे पर इन पोल के परिणामो से असहमति साफ नजर आ रही थी। इसका  कारण ये था की धरातल से जो खबरें उन्हें मिल रही थी वो इनसे मेल नही खा रही थी। उनमे से बहुत से रिपोर्टर और एंकर या तो खुद बिहार से थे या रिपोर्टिंग के लिए बिहार गए थे। उन्होंने वहां महागठबंधन के पक्ष में एक स्पष्ट माहोल देखा था इसलिए उनका दिमाग इन सर्वे रिजल्ट को स्वीकार नही कर पा रहा था। वोटों की गिनती से पहले NDTV पर प्रसारित किये गए हंसा रिसर्च के सर्वे में बीजेपी गठबंधन को आगे बताया गया। ये प्रोग्राम प्रसारित करते समय एंकरिंग रवीश कुमार कर रहे थे, जिनकी निजी राय के अनुसार महागठबंधन बिहार में 160 सीटें जीतने जा रहा था। जहां तक NDTV का सवाल है उसकी प्रतिष्ठा इतनी तो जरूर है की कोई ये नही मानता की ये सर्वे उसने जानबूझकर बीजेपी के पक्ष में दिखाया है। फिर क्या हुआ। बिहार चुनाव में एग्जिट पोल करने वाली ज्यादातर संस्थाएं वहां के असल हालात को क्यों नही पकड़ पाई। सबके परिणाम गलत क्यों साबित हुए ?
                मुझे लगता है की एग्जिट पोल करने की जो पध्दति है उसमे कुछ गंभीर किस्म की खामियां हैं। ये खामी उनमे हमेशा शामिल रहती है भले ही किसी बार ये पोल सही भी क्यों ना साबित हुए हों। उनका तरीका भले ही कितना ही वैज्ञानिक होने का दावा करे, भारत जैसे देश में उसको एकदम सटीक होने के लिए अभी बहुत लम्बा रास्ता तय करना पड़ेगा। इस बात को कई सर्वे करने वाले लोग भी मानते हैं की उनके सैंपल लेते वक्त एक अपर-क्लास बायस रहता है कम या ज्यादा। लेकिन इसके अलावा भी कई चीजें हैं जो उनके परिणामो को गलत दिशा में ले जाती हैं।
                     इनमे एक चीज जो सबसे ज्यादा इनके परिणामो को प्रभावित करती है वो हर समाज और समूह द्वारा किये गए वोटिंग प्रतिशत की जानकारी ना होना है। हर संस्था अपने पोल को ज्यादा से ज्यादा सटीक और वैज्ञानिक बनाने के लिए हर सम्भव प्रयास करती है। वो ये भी देखती है की सर्वे किये जाने वाले इलाके में किस जाती समूह का वोट प्रतिशत कितना है, और इस बात की पूरी कोशिश भी करती है की उनके सैंपल उसी हिसाब से लिए जाएँ। लेकिन हमारे यहां अलग अलग समूहों का वोट डालने का प्रतिशत हमेशा अलग अलग होता है। जिस तरह शहर और गांवों के वोटिंग प्रतिशत में फर्क होता है, उसी तरह अलग अलग समूहों के वोटिंग प्रतिशत में भी फर्क होता है। और ये फर्क कभी कभी बहुत ही निर्णायक होता है। लेकिन इसकी सुचना उसी दिन सर्वे एजेंसी के पास नही होती। इस तरह की सूचनाएं आने में समय लगता है। इसलिए सर्वे करने वाली एजेंसी उसे समान मानकर नतीजे निकाल देती है जो परिणामो को एकदम बदल देते हैं। ये वैसा ही है जैसे बिहार चुनाव की गिनती शुरू होने के तुरंत बाद पोस्टल बैलेट की गिनती ने एक घंटा पुरे देश को नचाकर रख दिया था और वो बीजेपी की एकतरफा जीत दिखा रहे थे। डाक से वोट भेजने वाले मतदाताओं का समूह बिहार के कुल मतदाताओं से एकदम विपरीत वोट कर रहा था।
                          दूसरा सबसे बड़ा कारण ये है की गरीब और अल्पसंख्यक तथा अनुसूचित जाति  और जनजाति के लोग सैम्पल लेने वाले आदमी को सही बात नही बताते। मेरा खुद का अनुभव है की एक बार रोज मेरे साथ रहने वाले एक अनुसूचित जाति के आदमी ने मुझे उसके द्वारा दी जाने वाली वोट के बारे में गलत सुचना दी थी। सही सम्पलिंग के लिए सर्वे करने वाली संस्थाओं को उसी समूह या जाति के आदमी का इस्तेमाल करना पड़ेगा वरना उसमे गलत सुचना मिलने की पूरी पूरी संभावना हैं।
                      हमारा समाज एक बहुत ही जटिल समाज है। इसमें सैंपल के आधार पर किये जाने वाले सर्वे के लिए एकदम वैज्ञानिक और सटीक तरीके की खोज करना बहुत ही दुरूह काम है। अभी इसमें पता नही कितने सुधारों की जरूरत पड़ेगी। इसलिए बिहार चुनाव के एग्जिट पोल करने वाले चैनल गलत साबित हुए।

Tuesday, November 3, 2015

कहां है असहिष्णुता ? कहां है असहनशीलता ?

                         देश के कुछ बुद्धिजीविओं ने कहा की देश में असहनशीलता और असहिष्णुता का माहौल है। उन्होंने इस बात पर की सरकार इस माहौल को ठीक करने के लिए काम करने की बजाए, उन संगठनो को बढ़ावा दे रही है जो इस माहोल को बिगाड़ रहे हैं अपने पुरुस्कार लौटा दिए।
                         इस पर प्रतिक्रिया हुई, जो की होनी ही थी। पहले तो सरकार के प्रवक्ताओं ने इस देश में हुए अब तक के सारे अपराध ये कह कर गिनवा दिए की तब इन्होने पुरुस्कार क्यों नही लोटाये। इससे बात नही बनी। पुरुस्कार लौटाने का सिलसिला जारी रहा। अब इस को और ज्यादा जोर से गलत साबित करने की जरूरत थी। उसके बाद जो हुआ, वो इस प्रकार है। -
                           सरकार के एक प्रवक्ता ने कहा की देश में कोई असहनशीलता का माहोल नही है। देश एकदम सही और शांतिपूर्वक तरीके से चल रहा है। ये जो साहित्यकार हैं, ये सब के सब या तो वामपंथी हैं या कांग्रेसी हैं। ये अपना सरक्षण खत्म होने के कारण घबराये हुए हैं। इन्होने बहुत मलाई काटी है। इन्होने अपनी किताबें बेचीं हैं और देश में मुफ्त का सम्मान प्राप्त किया है। पिछले साठ सालो में आरएसएस से संबंधित लोगों को पुरुस्कार नही दिए गए। ये मान लेते हैं की उनमे कोई काबिल नही था, लेकिन क्या इसको लोकतंत्र कहते हैं। कुछ तो दिया होता। लेकिन नही, सारे अकादमिक पदों पर यही लोग बैठ गए। हमारे लोगों को तीसरे दर्जे  में भी नही बैठने दिया, क्या ये लोकतंत्र है ? लोकतंत्र मिलबाँटकर खाने का नाम होता है लेकिन इन्होने हमे केवल इसलिए नही पूछा की हम काबिल नही थे। अब हम इन सब लोगों की सफाई कर देंगे। हर एक अकादमिक संस्थान में एक गजेन्द्र चौहान बिठा देंगे। और इन लोगों के सारे काम पर प्रतिबंध लगा देंगे। साथ में मैं ये भी कहना चाहता हूँ की देश में पूरी तरह सहनशीलता का माहोल है। ये लोग समझ लें इस बात को।
                       उसके बाद दूसरे प्रवक्ता आये। उसने कहा की ये सब लोग राजनीती कर रहे हैं और हम इसको बर्दाश्त नही करेंगे। ये लोग राष्ट्र विरोधी हैं। ये सब देश विरोधी है। ये सब हिन्दू विरोधी हैं। ये ऐसे ऐसे कालेजों से आये हैं जहां नकस्लवादी भरे पड़े हैं। वहां हम BSF का कैंप बना देंगे। हम उन युनिवर्सिटियों को बंद कर देंगे। मान लिया की उनमे से बहुत से लोग अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बहुत सम्मान रखते हैं लेकिन उससे हमे क्या फर्क पड़ता है। हमने नोबल पुरुस्कार प्राप्त अमृत्य सेन को नालंदा विश्वविद्यालय से बाहर किया या नही। हमने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज को नक्सलवादी बताकर जेल में बंद किया या नही। हमारे खिलाफ कोई किताब लिखी जाएगी तो हम उसका मुंह काला कर देंगे। लोगों को क्या खाना चाहिए ये जब तक हमारी सरकार है तब तक तो हम ही बताएंगे, वरना मारे भी जा सकते हैं। और जहां तक असहिष्णुता की बात है ऐसा कुछ भी नही है। अगर ये लोग बोलना, लिखना बंद कर दें तो इनको कोन क्या कहता है ?
                         मुझे बचपन में सुनी हुई एक कहावत याद आ गयी। एक आदमी अपनी पत्नी को चिट्ठी लिख रहा था। उसका एक दोस्त नजर बचाकर उसे पढ़ रहा था। ये बात उस आदमी को मालूम हो गयी। उसने चिट्ठी में लिखा की शेष बातें दूसरे पत्र में लिखूंगा। अभी तो एक मुर्ख दोस्त पास बैठा हुआ चिट्ठी पढ़ रहा है। उसका दोस्त तुरंत बोला की कमाल है यार, मैंने कुछ नही पढ़ा, फालतू में मुझे मुर्ख ना बताओ। चिट्ठी लिखने वाला आदमी बोला की क्या अब भी किसी प्रमाण की जरूरत है ? बात समझ में आते ही उसका दोस्त बहुत शर्मिंदा हुआ और उसने माफ़ी मांगी। परन्तु या तो ये लोग अब भी समझ नही पा  रहे हैं या फिर इनमे इतनी नैतिकता भी नही बची है।
                           इसके बाद कुछ लोग और आये। उनसे पूछा गया की ये कौन हैं ? तो उनमे से कई रो पड़े, बोले देखा, हमे कोई नही पहचानता। क्योंकि हमे साहित्य अकादमी सम्मान नही दिया गया इसलिए ये हालत है। इन लोगों को जब पुरुस्कार मिला था तब भी इनकी तारीफ हो रही थी और जब ये लोटा रहे हैं तब भी इनकी तारीफ हो रही है। लेकिन इन्हे बताना होगा इन्होने 1984 में सम्मान क्यों नही लौटाया, 1975 में क्यों नही लौटाया। तब ये कहां थे ?
                             एक पत्रकार ने पूछ लिया  आप तब कहां थे ?
                         देखिये हम तो कभी भी कहीं नही होते। ना हम 1984 में कहीं थे, ना 1975 में कहीं थे। दूसरी बात ये है की  हमारे पास लौटाने को था ही क्या। अब हमे सरकार ने कहा है की वो हमे एडजस्ट करेगी।
                            लेकिन माहौल के बारे में आपका क्या कहना है ?
                        माहोल तो एकदम सही है। अगर आपको लिखना ही है तो ऐसी चीज लिखिए जिससे किसी को भी खराब ना लगे। सरकार की प्रशंसा में गीत लिखिए। आरएसएस की विचारधारा को समर्थन देते हुए नाटक लिखिए, भले ही लोग उसको प्रहसन समझें। उसके बाद आपको कोई कुछ कहता है तो बताइये। आप सरकार और हिंदुत्व के खिलाफ फिल्म बनाएंगे तो क्या सरकार आपको छोड़ देगी ? उसके बाद माहोल को दोष देना गलत बात है। हमे तो किसी ने कुछ नही कहा।
                          आपने क्या लिखा है ?
                        पांच साल पहले एक कविता लिखी थी तितली पर। मेरा पोता अब तक उसे गाता है। हमे तो कोई धमकी नही मिली।

Saturday, October 31, 2015

बिहार चुनाव में बीजेपी की चिंता के पांच कारण

बिहार चुनाव में सबको बीजेपी के प्रचार में एक हड़बड़ाहट दिखाई दे रही है। बीजेपी ने कई बार अपनी रणनीति में परिवर्तन किये हैं और प्रचार में स्वयं प्रधानमंत्री ने कुछ ऐसी बातें कहि हैं जिन्हे राजनितिक विश्लेषक उनके स्तर का नही मानते। क्या कारण है की बिहार चुनाव में बीजेपी अपने प्रदर्शन के प्रति आश्वस्त नही हो पा रही है। अब तक मिली सूचनाओं और हालात की खबरें आ रही हैं उनके अनुसार बिहार चुनाव में बीजेपी को ये पांच प्रमुख कारण चिंता में डेल हुए हैं।

१.   बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नितीश कुमार के खिलाफ कोई एंटी-इन्कम्बैंसी दिखाई नही दे रही है। बिहार के लोग नितीश कुमार को अब तक का सबसे अच्छा मुख्यमंत्री मानते हैं। उन पर ना कोई आरोप है और ना कोई भृष्टाचार का दाग है। इसकी कोई काट अब तक बीजेपी निकाल नही पाई है, बीजेपी ने नितीश पर भृष्टाचार के कुछ आरोप लगाने की कोशिश तो की है लेकिन बिहार की जनता इसे केवल चुनाव प्रचार मानती है। ये बीजेपी की चिंता का प्रमुख कारण है।

२.   बिहार में बीजेपी के पास कोई स्थानीय चेहरा नही है जिसे वो नितीश के मुकाबले में मतदाताओं के सामने पेश कर सके। अब तक कई राज्यों में बीजेपी ने बिना किसी मुख्यमंत्री की घोषणा किये चुनाव लड़ा है। उन राज्यों में बीजेपी अपनी जीत को इस रणनीति से जोड़कर देख रही है। जबकि उन राज्यों में बीजेपी की जीत का असली कारण वहां की सरकारों के खिलाफ जनता में रोष का भाव था। बिहार में पहले से बीजेपी अपना मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने पर बिहार के स्थानीय नेताओं के मतभेद सामने आने से भी डर रही है। अब तक बीजेपी इस रणनीति पर चलती रही है की जिस जाती और इलाके में जाओ, उसके नेता को ही मुख्यमंत्री के रूप में पेश कर दो। इससे कई बार फायदा भी होता रहा है लेकिन बिहार में ये फार्मूला काम नही कर रहा है जो बीजेपी की चिंता का कारण है।

३.   लालू प्रशाद यादव एक बार फिर यादवों के और पिछड़ों के नेता के रूप में उभर रहे हैं। पहले के चुनावों में इधर-उधर खिसका यादव दुबारा उनके साथ गोलबंद हो रहा है। बीजेपी की पूरी कोशिश और लालू यादव की खराब छवि के बावजूद यादव और पिछड़े उसके साथ खड़े हो रहे हैं। रही सही कसर मिहं भागवत के बयान ने पूरी कर दी। बीजेपी बिहार में जातीय समीकरण का कोई तोड़ नही खोज पा रही है और ये भी उसकी चिंता का कारण है।

४.   बिहार में मुस्लिमो की बड़ी संख्या है और मुस्लिम इस बार सख्ती से महागठबंधन के साथ हैं। लालू, निटश के इकट्ठा होने से उनके बीच से असमंजस खत्म हो गयी है। बीजेपी के मुस्लिम विरोधी और साम्प्रदायिक ब्यानो ने उन्हें तेजी से महागठबंधन के  दिया है। मुस्लिम धुर्वीकरण के खिलाफ बीजेपी को उम्मीद थी की इससे दूसरी तरफ हिन्दू मतों का भी धुर्वीकरण होगा। लेकिन ऐसा हो नही रहा है। इसका मुख्य कारण बिहारी समाज में हिन्दू और मुसलमानो के बीच किसी तनाव का उपस्थित ना होना है। बीजेपी लाख कोशिश करने के बावजूद ये धुर्वीकरण करने में कामयाब नही हो पाई। आरएसएस की कोशिशें भी बेकार हो गयी। इसलिए ये भी बीजेपी की चिंता का एक कारण है।

५.   बिहार की राजनीती में एक नई चीज उभर कर सामने आई है, वो है महिला वोट बैंक। पुरे देश से अलग बिहार में महिलाओं का एक अलग वोट बैंक सामने आ रहा है जो वोटों के प्रतिशत और महिलाओं के मुद्दो के रूप में सामने आया है। नितीश सरकार ने छात्राओं को साईकिल दे कर बिहार की लड़कियों में एक नया आत्मविश्वास पैदा किया है। कानून व्यवस्था की स्थिति में सुधार के चलते बिहार में ये महिला वोट बैंक नितीश के समर्थन में माना जा रहा है। अब चुनाव में नितीश का महिलाओं को नौकरियों में 35 % आरक्षण का वायदा महिलाओं को आकर्षित कर रहा है। इस वोट बैंक की कोई काट बीजेपी के पास नही है। साथ ही आरएसएस की महिला विरोधी छवि इस आग में घी डालने का काम कर रही है। ये वोट बैंक बीजेपी के लिए एक बड़ी चिंता का कारण है।

 

Friday, October 30, 2015

चेतन भगत - यानी एक भक्त का रुदन

कल के दिव्य भास्कर ( गुजराती ) में चेतन भगत का एक लेख छपा है। जिसमे चेतन भगत ने सोशल मिडिया में उन्हें और उन जैसे लोगों को " भक्त " कहने पर एतराज किया है। ये एतराज वो कर सकते हैं लेकिन उन्होंने इन तथाकथित भक्तों और उनके लिए इस शब्द का इस्तेमाल करने वाले उदारवादियों की परिभाषा और प्रकृति बताने की कोशिश भी की है। उसने इन उदारवादियों के बारे में कहा है की ये अपार पैसे और सम्पत्ति के बीच में  पैदा हुए और अंग्रेजी माध्यम में पढ़े लिखे ऐसे लोगों की जमात है जिन्हे दुनिया के बारे में और वैश्विक संस्कृति के बारे में तो ज्यादा जानकारी होती है लेकिन इनके पास किसी समस्या का कोई इलाज नही होता।
                     दूसरी तरफ उसने " भक्त " के सम्बोधन से सम्बोधित किये जाने वाले लोगों की विशेषता बताते हुए लिखा है की ये राष्ट्रवादी बच्चे, जो प्रतिभाशाली और भारतीय संस्कृति के जानकर और आर्थिक विकास के इच्छुक विशाल समूह हैं। उसके बाद  वो सब बातें कहि जो टीवी चैनलों में बैठने वाले बीजेपी और आरएसएस के प्रतिनिधि और सोशल मीडिया में बैठे ये " भक्त " हमेशा कहते हैं। जैसे ये कांग्रेस की लड़ाई लड़ रहे हैं और की असुरक्षित महसूस कर रहे हैं और की मुस्लिम कटट्रपंथियों के खिलाफ कभी बोलते नही हैं।
                     चेतन भगत और उन जैसे लोगों के लिए " भक्त " शब्द का इस्तेमाल क्यों किया जाता है उसका एक मुख्य कारण तो खुद उनके लेख में ही है। अपने लेख के अंत में दिए गए प्रवचन में उसने कहा है की हमे एक समाज बन कर रहने की जरूरत है ये बात इन उदारवादियों को समझनी चाहिए। क्या बात है भगत साहब ! एक समाज बनाने के लिए आपकी सरकार और संगठन ने पिछले 18 महीनो और उससे पहले भी जितने काम किये हैं वो सबके सामने हैं। चेतन भगत ने हर बार की तरह और एक सच्चे भगत की तरह इस आरोप को भी दोहराया है की गोधरा की घटना में मारे गए कारसेवकों पर  शब्द नही बोले और उनके लिए कुछ नही किया। और उसके बाद के दंगों पर हमेशा बात करते हैं। तो मैं ये पूछना चाहता हूँ की 13 साल बाद भी आपकी सरकार ट्रेन जलाने वाले असली मुजरिमो को पकड़ क्यों नही पाई। जिन लोगों को आपकी सरकार ने  पकड़ा था उन्हें तो उच्चत्तम न्यायालय ये कह कर बरी कर चूका है की उनको फ्रेम किया गया था।
                       अब मैं मुख्य सवाल पर आता हूँ। जिन लोगों को चेतन भगत अपार पैसे में पले और अंग्रेजी के महंगे स्कूलों में पढ़ा लिखा बताते हैं, इनमे से ऐसा कौन है ? ये सब लोग तो दूरदराज के गावों से आने वाले वो लोग हैं जो इंसानियत और उसके रास्ते, दोनों चीजों को समझते हैं। ये पढ़े लिखे ज्यादा हैं या ये दुनिया को ज्यादा अच्छी तरह से समझते हैं तो ये कोई आरोप हुआ ? आप लोगों के पास गजेन्द्र चौहान से ज्यादा जानकार और काबिल लोग नही हैं तो इसमें इन उदारवादियों की क्या गलती है। विख्यात साहित्यकार काशीनाथ सिंह ने आपको बाजारू लेखक कहा तो एक बार उनके सामने बैठ कर पूछते तो की ऐसा क्यों कहा। वैसे आप जैसे भक्तों का ये नामकरण किया ही इसलिए गया है की एक भक्त कभी भी अपने आराध्य देव द्वारा किये गए किसी भी काम का  कभी विश्लेषण नही करता। अभी भी लोग आसाराम बापू को फूल चढ़ाने जेल के दरवाजे तक जाते हैं इन्हे कहते हैं भक्त।
                       मैं आपसे घटनाओं का सही और निष्पक्ष विश्लेषण करने के लिए नही कहूँगा , क्योंकि भक्तों में इसकी तो योग्यता ही नही होती। फिर भी मैं आपको उसी दिन के उसी अख़बार में उर्विश कोठारी का एक व्यंग लेख जो " ट्राफिक पोलिस-भद्रंभद्र संवाद " के शीर्षक से छपा है पढ़ने की सलाह जरूर दूंगा। उसमे उन्होंने लिखा है , " की भद्रंभद्रो केवल जड़ता पूर्वक भूतकाल से चिपके तो रह सकते है,  उसमे से कुछ भी ना सिखने के लिए कृत-निश्चयी भी होते हैं। यही उनके भद्रंभद्र होने का कारण है और यही प्रमाण है। "
                         चेतन भगत " भक्त " इसमें  भद्रंभद्र की जगह केवल भक्त कर लें तो शायद बात उनकी समझ में आ जाये, लेकिन हो सकता है तब भी ना आये आखिर " भक्त " जो ठहरे।

Wednesday, October 28, 2015

NEWS -- FTII के आंदोलनकारी छात्रों को मुबारकबाद

 FTII के 140 दिन से हड़ताल कर रहे छात्रों ने आज अपनी हड़ताल समाप्त कर दी और आंदोलन और विरोध जारी रखने का फैसला लिया। कुछ  लोगों का ऐसा कहना की हड़ताल बिना किसी नतीजे के वापिस हो गयी ये सही नही है। असलियत तो ये है की इस हड़ताल ने इस सरकार के तानाशाह, नासमझ और अलोकतांत्रिक चरित्र को बेनकाब कर दिया। हम ये समझ सकते हैं की बीजेपी और संघ के पास गजेन्द्र चौहान से ज्यादा लायक लोग नही हैं, लेकिन ये जरूरी नही है की हर पद पर संघ के लोगों की ही नियुक्ति की जाये भले ही उनका स्तर जो भी हो। एक तानाशाह और निरकुंश सरकार, जिसको अपनी 56 " की छाती का बड़ा गरूर था और जो उसका प्रदर्शन सीमा पर नही कर पाई, उसने छात्रों के सामने इसका बखूबी प्रदर्शन किया। और ये सारा नजारा लोगों की नजरों में ही नही आता अगर FTII के छात्र इसका विरोध नही करते। इस सरकार ने झारखंड में आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलवादियों को एक करोड़ रुपया देने की घोषणा की है और ये बता दिया है की लोकतान्त्रिक ढंग से चलने वाले आंदोलनों की वो परवाह नही करती और बंदूक के सामने खड़े होने की उसकी औकात नही है।  ये उसके 56 " की छाती की हकीकत है। इस पुरे आंदोलन  के लिए देश की जनता की तरह से उन्हें मुबारकबाद।
                     जैसे ही ये खबर आई, मंत्रिमंडल में बैठे अक्षम मंत्रियों ने इसका स्वागत किया। वो किस चीज का स्वागत कर रहे थे पता नही, परन्तु तभी ये खबर भी आ गयी की फिल्म उद्योग से जुड़े और FTII के छात्र रहे दस लोगों ने राष्ट्रिय पुरुस्कार लौटाने की घोषणा कर दी। ये सरकार के मुंह पर करारा तमाचा है। हालाँकि अभी सरकार के पास इनको वामपंथी बताने का विकल्प खुला हुआ है।
                        एक सामान्य नागरिक की तरफ से FTII के छात्रों को एकबार फिर मुबारकबाद।

बिहार में बीजेपी को वोट ना देने के 10 कारण

बिहार चुनाव में बिहार की जनता को बीजेपी को वोट क्यों नही देना चाहिए, इसके मुख्य दस कारण निम्नलिखित हैं।
१.  लोकसभा चुनाव में किये गए मोदी जी के वायदों को पूरा नही करना।
२.  देश में साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने का विरोध ।
३.  पुरे देश में साहित्यकारों के खिलाफ हमले और दुष्प्रचार।
४.  पुरे देश में उच्च शिक्षा के छात्रों के खिलाफ दमन चक्र।
५.  देश में बढ़ती हुई महंगाई के विरोध में।
६.   रेल व दूसरी सरकारी सेवाओं में आम जनता की लूट के खिलाफ।
७.  शिक्षा सहित सभी महत्त्वपूर्ण संस्थाओं में संघ के अक्षम लोगों की नियुक्तियां।
८.  विदेशो में सरकारी यात्राओं के दौरान विपक्ष पर हमलों का विरोध।
९   दिल्ली सहित विपक्षी राज्य सरकारों को काम ना करने देने के लिए।
१०. जनहित की सभी योजनाओं जैसे शिक्षा, स्वास्थय, मनरेगा और बच्चों के बजट में कटौती के विरोध में।

                हालाँकि इस तरह के कारणों की लिस्ट कहीं लम्बी है, फिर भी ये वो कारण हैं जिन पर पुरे देश के सही सोच वाले लोग दुखी हैं।

Monday, October 26, 2015

NEWS -- बिहार चुनाव में मोदी जी का साम्प्रदायिक कार्ड

खबरी -- मोदी जी के आज बक्सर की रैली में भाषण के क्या मायने हैं ?

गप्पी -- बीजेपी और मोदी जी, दोनों को अब ये अधिकाधिक स्पष्ट होता जा रहा है की वो बिहार चुनाव हार रहे हैं। चुनाव प्रचार शुरू होने के बाद बीजेपी के नेताओं ने जो भी मुद्दे उठाये उनसे उनका नुकशान ही ज्यादा हुआ। बाद में मोहन भागवत के आरक्षण पर दिए गए भाषण ने पूरी बजी ही पलट दी और बीजेपी का एजेंडा खुल कर सामने आ गया। अब बक्सर की रैली में मोदी जी ने ये कह कर की नितीश और लालू प्रशाद दलितों और पिछड़ों का आरक्षण छीन कर मुसलमानो को देना चाहते हैं और वो यानि मोदी जी अपनी जान दे देंगे लेकिन उनका आरक्षण नही छीनने देंगे, संघ की पुरानी साम्प्रदायिक लाइन ले ली है।  मोदी जी को मालूम है की मुसलमानो का तो कोई वोट उन्हें मिलने वाला नही है और दलितों और पिछड़ों के वोट में अगर वो सेंध नही लगा पाये तो वो चुनाव नही जीत सकते। इसलिए ये मोदी जी और आरएसएस का आखरी दांव है।
                     लेकिन अगर आरक्षण का मुद्दा मोदी जी और आरएसएस बहस में लेकर आते हैं तो उन्हें कुछ अप्रिय सवालों के जवाब भी देने पड़ेंगे। जैसे लालू जी पहले दिन से जातिगत जनगणना का मसला उठा रहे हैं। लालू जी का कहना है की जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी किये जाएँ और दलितों और पिछड़ों को उनकी जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण दिया जाये। इस पर बीजेपी को अपना रुख साफ करना होगा। दूसरा आर्थिक आधार पर आरक्षण के मोहन भागवत के बयान पर भी उन्हें स्पष्ट जवाब देना होगा। जातिगत आरक्षण के युद्ध में मोदी जी लालू और नितीश को हरा पाएंगे अभी तो मुस्किल लगता है, बाकि वक्त बताएगा।

Sunday, October 25, 2015

OPINION -- " मन की बात " केवल " मीठे प्रवचन " बन गयी है।

             हर महीने की तरह आज भी प्रधानमंत्री की मन की बात हुई। देश के सामने पिछले एक महीने में कई जलते हुए सवाल सामने आकर खड़े हो गए हैं। पुरे देश से प्रधानमंत्री से इस पर बोलने और कुछ बातों की स्पष्टता करने की मांग जोर से उठ रही है। लेकिन इस बार फिर मन की बात केवल " मीठे प्रवचन " ही साबित हुई। मैं हैरान हूँ की देश के सबसे जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति को एक भी सवाल पर बोलने की जरूरत महसूस नही हुई। प्रधानमंत्री ने कहा की भारत- दक्षिणी अफ्रीका मैच दिलचस्प दौर में पहुंच गया है। सुन कर वितृष्णा सी हुई। क्या देश ये बात सुनने के लिए इंतजार कर रहा था। एक बात बिलकुल साफ हो गयी की मन की बात के लिए जो लोग भी भाषण लिखते हैं, उन्हें ये निर्देश दिए गए हैं की देश की किसी भी प्रमुख समस्या का जिक्र भाषण में नही होना चाहिए। प्रधानमंत्री जनता के किसी भी सवाल का जवाब देना ना तो जरूरी समझते हैं और ना ही उपयोगी।
                 इस बात का आरोप लगता रहा है की हमारे प्रधानमंत्री बोलने में बहुत कुशल हैं और इस कुशलता का वो भरपूर फायदा भी उठाते हैं। लेकिन ये बात भी उतनी ही सच है की ये सारी कुशलता वहां तक ही सिमित है जहां किसी की सवाल का जवाब नही देना हो। अपने बोलने की आदत को लेकर प्रधानमंत्री ने कुछ नई परम्पराएँ भी स्थापित की हैं। जैसे अब तक ये परम्परा रही थी की कोई भी प्रधानमंत्री अपने विदेश दौरों पर घरेलू मतभेदों की बात नही करते थे। पिछली सरकार द्वारा लिए गए निर्णयों को वर्तमान सरकार द्वारा समर्थन दिया जाता था। क्योंकि विदेश नीति एक निरंतर प्रक्रिया है और किसी भी विदेशी सरकार को इस बात से कोई मतलब नही होता की कब किस पार्टी की सरकार रही। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने अपने सभी विदेशी यात्राओं में पिछली सरकार को नालायक, अक्षम और भृष्ट साबित करने की पूरी कोशिश की। पहले ऐसा कभी नही हुआ। अब विदेश नीति के मामले पर भी पार्टीगत लाइन लेने की शुरुआत कर दी गयी जो देश हित में नही है। क्योंकि ऐसा तो हो नही सकता की प्रधानमंत्री विदेश में ये कहें की आप आईये और हमारे देश में निवेश कीजिये और अब तक जो भृष्टाचार हमारे देश में होता था उसे हम बंद कर रहे हैं और इसके जवाब में कांग्रेस या पिछली सरकारों में रहे लोग ये कहें की हाँ, प्रधानमंत्री बिलकुल सच कह रहे हैं। प्रधानमंत्री ये कहें की हम पिछली सरकारों द्वारा की गयी गलतियों को सुधार रहे हैं और कांग्रेस ये कहे की हाँ, ये सरकार हमारी गलतियां सुधार रही है।
                    दूसरी जो चीज सामने आई है वो ये है की प्रधानमंत्री की ये सारी मुखरता तभी सामने आती है जब सामने कोई जवाब देने वाला नही होता। जब भी ऐसा मौका आया है की सामने दूसरे लोग भी मौजूद हैं जो आपकी बात का जवाब भी देंगे और सवाल भी खड़े करेंगे वहां प्रधानमंत्री कन्नी काट जाते हैं। इसके कुछ बहुत ही महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं। पहला ये की डेढ़ साल की सरकार के बाद भी प्रधानमंत्री ने एक भी पत्रकार वार्ता आयोजित नही की। जबकि ये परम्परा रही है की प्रधानमंत्री समय समय पर देश के प्रमुख संपादकों के साथ बातचीत का आयोजन करते हैं, उनके सवालों के जवाब देते हैं और सरकार के फैसलों के ओचित्य साबित करते हैं। लेकिन ऐसा एक बार भी नही हुआ। दूसरा उदाहरण संसद का है। पूरा का पूरा सत्र बेकार हो गया लेकिन प्रधानमंत्री ने विपक्ष के उठाये किसी भी मामले पर चुप्पी नही तोड़ी। यहां तक की प्रधानमंत्री संसद की बैठकों में आने से भी बचते रहे। संसद में चल रहे गतिरोध को दूर करने के प्रधानमंत्री की तरफ से कोई भी प्रयास नही हुए और सरकार द्वारा बुलाई गयी एकमात्र सर्वदलीय बैठक में भी प्रधानमंत्री नही आये। इसलिए ये बात अब जोर पकड़ने लगी है की प्रधानमंत्री वहीं बोलते हैं जहां कोई दूसरा नही होता। ऐसा तो लोकतंत्र की परम्परा नही है। फिर विपक्ष पर ये आरोप लगाना की वो सरकार का सहयोग नही कर रहा है एकदम उलटी ही बात है। संसद में लटके हुए कई बिलों पर जिनकी कॉर्पोरेट सैक्टर को बीजेपी से बहुत जल्दी पास करने की उम्मीद थी अब उसकी आशाएं और धर्य खत्म होता जा रहा है। अभी कॉर्पोरेट सैक्टर इस पर एतराज नही जताता लेकिन वह बहुत दिन इंतजार कर पायेगा इसमें शक है। राहुल बजाज और रतन टाटा जैसे लोग तो थोड़ा थोड़ा बोलना भी शुरू कर चुके हैं।
                 प्रधानमंत्री देश के नेता होते हैं। आज जब देश में जातीय और साम्प्रदायिक हमलों की बाढ़ सी आ गयी है और अभिव्यक्ति की आजादी पर सवाल खड़े हो रहे हैं और इन सब का आरोप उन्ही संगठनो पर लग रहा है जिस संगठन से खुद प्रधानमंत्री और उनके ज्यादातर मंत्री आते है, ऐसी हालत में लोग प्रधानमंत्री से आश्वासन चाहते हैं। और प्रधानमंत्री केवल प्रवचन दे रहे हैं। लोगों में ये बात घर कर रही है की संत-महंत और साधु साध्वियां सरकार चला रहे हैं और नेता प्रवचन कर रहे हैं।