Wednesday, September 30, 2015

RBI द्वारा ब्याज दर में कमी और विकास के दावे


 RBI ने ब्याज दरों में 50 पैसे की कटौती कर ही दी। कई दिनों से सरकार और खासकर वित्त मंत्री अरुण जेटली रिजर्व बैंक के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे थे। इस नाराजगी में सरकार ऐसा आभास दे रही थी जैसे इस देश का विकास रिजर्व बैंक ने रोक हुआ हो। ब्याज दरों में कमी से मांग में बढ़ौतरी होती है ये बात तो सही है लेकिन रिजर्व बैंक द्वारा की गयी कमी का उपयोग किस चीज के लिए होता है सब कुछ इस पर निर्भर करता है।
                    रिजर्व बैंक अब तक एक रूपये पच्चीस पैसे की कटौती कर चूका है लेकिन बैंकों ने मुस्किल से पचास पैसे घटाए हैं। RBI के गवर्नर रघुराम राजन इस पर आपत्ति भी प्रकट कर चुके हैं। इस बार की कटौती के बाद भी एकाध बैंक ने बीस पैसे की कटौती की घोषणा की है। केंद्रीय बैंक की दरों में कटौती का प्रयोग बैंको ने अपने मुनाफे बढ़ाने के लिए कर लिया। जब तक बैंक आम उपभोक्ता तक ब्याज दरों में कटौती का लाभ नही पहुंचाएंगे उससे मार्किट में तेजी कैसे आएगी। लेकिन हमारे वित्त मंत्री जो बार बार गवर्नर से अपनी नाराजगी प्रकट करते रहे हैं, उन्होंने बैंकों के लिए एक शब्द नही बोला। हमारे बैंकों की और पुरे प्राइवेट सैक्टर की हालत ये है की वो किसी की नही सुनता। और सरकार की इच्छा भी उससे कुछ कहने की नही है। अब तक पॉलिसी के रूप में जो भी निर्णय लिए गए हैं वो सभी निजी सैक्टर ने अपने मुनाफे के लिए उपयोग कर लिए हैं।
                    बैंक जैसे ही ब्याज दर में कमी होती है डिपॉज़िट पर ब्याज दर घटा देते हैं। इससे पेंशन और जमापूंजी के ब्याज पर गुजर करने वाले लोगों के लिए मुश्किल खड़ी हो जाती है। दूसरी तरफ बैंक लोन की ब्याज दरों में कोई कटौती नही करते हैं या नाम मात्र की कमी करते हैं जिससे मांग पर कोई असर नही पड़ता है। इसके लिए बैंक गुंजाइश ना होने का बहाना बनाते हैं। इस गुंजाइश ना होने का सबसे बड़ा कारण ये है की निजी क्षेत्र इन बैंको का लाखों करोड़ रुपया खाकर बैठ गया है। हर साल NPA का स्तर बढ़ता जाता है। बैंक हर साल निजी क्षेत्र का लाखों करोड़ रुपया माफ़ कर देते हैं जिससे उनके मुनाफे और बैलेंस सीट पर असर पड़ता है। और इस सारी स्थिति का बिझ वो आम आदमी पर डाल देते हैं चाहे वो बैंक में जमा कराने वाला हो या लोन लेने वाला हो। इस लालची और जन विरोधी तरीके को जब तक बदला नही जायेगा उसका मार्किट पर कोई असर पड़ने वाला नही है। और सरकार इस बारे में कुछ बोलती नही है या उसका समर्थन इनके साथ है।
                    दूसरा सवाल ब्याज दरों में कटौती का विदेशी पूंजी पर पड़ने वाला असर है। मार्किट के विशेषज्ञ ये मानते हैं की पिछले दिनों में विदेशों से भारत के DEBT में निवेश के बढ़ते आंकड़े का मुख्य कारण हमारे यहां की ऊँची ब्याज दरें हैं। जैसे ही रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कटौती करता है हमारे यहां से वो निवेश वापिस जाने की प्रकिर्या शुरू हो जाती है। इससे रूपये की कीमत गिरती है और हमारे आयत और महंगे हो जाते हैं। हमारा देश कच्चे मॉल का और पट्रोलियम पदार्थों का मुख्य आयात करता है। इनके महंगे होने से हमारा तैयार माल दूसरे देशों के मुकाबले महंगा हो जाता है और निर्यात और कम हो जाते हैं। इसलिए ये जरूरी नही है की ब्याज दरों में कटौती का लाभ ही हो।
                     अगर सरकार ब्याज दरों में कटौती को मांग बढ़ने के सायकिल के साथ जोड़ना चाहती है तो उसे ये सुनिश्चित करना होगा की ब्याज दरों में कटौती का लाभ निचे मार्किट तक पहुंचे और इसका इस्तेमाल बैंक अपने मुनाफे बढ़ाने के लिए ना करें। वरना ये सारी कवायद बेकार हो जाएगी।

The meet ban politics creating polarization

This is in the line what BJP want. When the people of this country realize this. A report on this publish in The Hindu by Samita Gupta. She said, "The murder of Mohammad Akhlaq in Dadri, on the edge of the national capital, by a violent Hindu mob on Wednesday should come as no surprise to those who have been closely following the ground level politics in western Uttar Pradesh and the meat/beef bans imposed by BJP-ruled States during the recent Jain festival of Paryushan."
Read the full story at --http://www.thehindu.com/news/national/politics-of-meat-ban-creating-polarisation/article7708079.ece?homepage=true

राजनीती और धरम के समाचारों पर एक टिप्पणी

खबरी -- केजरीवाल द्वारा बुलाये गए मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश हिस्सा नही लेंगे। 

गप्पी -- लेकिन ये तो कहा ही गया था की सम्मेलन गैर बीजेपी मुख्यमंत्रियों का है।

खबरी -- साध्वी प्राची ने मांग की है की हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों में मुस्लिमों के प्रवेश पर पाबंदी लगाई जाये। 

गप्पी -- जबकि जरूरत तो इस बात की है भगवा कपड़ों की आड़ में राजनीती से जुड़े और समाज में नफरत फ़ैलाने वाले लोगों के सभी धरमो के स्थलों में प्रवेश पर पाबंदी लगाई जाये। धार्मिक स्थलों में आदमी आदमी के बीच भेदभाव तो धर्म की असली भावना के ही खिलाफ है। गुरु नानक देव जी ने कहा है,
                 " अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत दे सब बन्दे। 
                   एक नूर ते सब जग उपजया, कौन भले कौन मन्दे। "

Tuesday, September 29, 2015

बिहार, भाजपा और जातिवाद की राजनीती

             बिहार में भाजपा लालू प्रसाद यादव पर जातिवाद की राजनीती का आरोप लगा रही है। साथ ही ये दावा भी कर रही है की वो ये चुनाव विकास के एजेंडे पर लड़ रही है। मीडिया भी जातिवाद की बात होते ही लालू यादव को लपेटना शुरू कर देता है। लेकिन सवाल ये है की कौन चाहता है की बिहार जातिवाद की राजनीती से बाहर निकले। बिहार में चुनाव लड़ने वाली सभी पार्टियों का अपना एजेंडा है जो कहीं ना कहीं जातिवाद से जाकर जुड़ जाता है।
                बिहार में जाती हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रही है। जमीनो पर अगदी जातियों का कब्जा और खेतिहर मजदूरी करने वाले लोगों के बीच का संघर्ष भी अपने अंतिम रूप में जाती युद्ध का रूप लेता रहा है। बीजेपी पुरे देश में हिंदूवादी राजनीती करती रही है भले ही वो इसकी पैकेजिंग कभी राष्ट्रवाद के नाम पर करती रही हो या संस्कृति के नाम पर। परन्तु उसके मूल में हमेशा हिंदुत्व की राजनीती रही है।पिछला लोकसभा चुनाव, जिसमे नरेंद्र मोदी को पूर्ण बहुमत मिला, उसके लिए बीजेपी ये दावा करती रही है की वो चुनाव विकास के नाम पर लड़ा गया था। लेकिन असलियत ये है की उस समय भी हिंदुत्व की विकासशील पैकेजिंग की गयी थी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ये है की लोकसभा में बीजेपी के चुने गए 282 सांसदों में एक भी मुस्लिम नही है। नारा था सबका साथ सबका विकास।
               अब जब बिहार का चुनाव नजदीक आ रहा था तो बीजेपी ही बिहार में जातिगत एजेंडा तय कर रही थी। नीतीश और लालू के जातीय गठबंधन को चुनौती देने के लिए बीजेपी ने ही जीतनराम मांझी को मोहरा बनाकर महादलित को राजनीती का मुद्दा बनाया। प्रधानमंत्री मोदी की रैलियों में केवल महादलित ही छाया रहा। लेकिन जातिगत राजनीती में लालूप्रसाद के यादव और उसके साथ ही पिछड़े वोट बैंक को कोई ढंग की चुनौती बीजेपी नही दे पाई। अगदी जातियों को अपने अपने पक्ष में गोलबंद करने की कोशिश में मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा करने वाला बयान दे दिया और फंस गए। इस बयान से बीजेपी को अगड़ों में तो समर्थन बढ़ा परन्तु दूसरी तरह पिछड़ों का धुर्वीकरण लालू यादव की तरफ होता दिखाई दिया। अब बीजेपी इस धुर्वीकरण को रोकने के लिए लालू यादव पर जातिगत राजनीती के आरोप लगा रहे हैं।
                 लेकिन क्या अब बीजेपी जातिगत राजनीती से किनारा कर रही है ? बिलकुल नही। जब लालू यादव ये कहते हैं की ये अगड़ों और पिछड़ों के बीच की लड़ाई है तो उसके जवाब में गिरिराज सिंह और रविशंकर प्रसाद ये बयान देते हैं की NDA का मुख्यमंत्री भी कोई दलित या पिछड़ा ही होगा और कोई स्वर्ण जाती का व्यक्ति मुख्यमंत्री नही होगा, ये बयान किस तरह जातिवादी नही है ?
                     राजनीती हमेशा दो पक्षों में होती है। ये दो पक्ष कभी हिन्दू और मुस्लिम हो सकते है, कभी अगड़े या पिछड़े हो सकते है या फिर आमिर और गरीब हो सकते हैं। आरएसएस और बीजेपी हमेशा आर्थिक आधार की बात करती रही है पर वो कोई भी चुनाव आमिर और गरीब के नाम पर नही लड़ सकती। अगर उसने ये कोशिश की तो मजदूरों और किसानो के सवाल बहस में आ जायेंगे। और ये सवाल बीजेपी के विरुद्ध जायेंगे। इसलिए बीजेपी भी चाहती है की बिहार का चुनाव जाती के आधार पर लड़ा जाये बस उसमे थोड़ा सा हिन्दुत्त्व का तड़का लगा हो। और हिंदुत्तव का तड़का लगाने के लिए उसने साध्वी निरंजन ज्योति सहित अपने पुरे भगवा संगठन को काम पर लगा दिया है। इस काम में उसे ओवैसी से भी बहुत उम्मीद है। दूसरी तरफ यादवों के गठजोड़ में भरम फ़ैलाने और सेंध लगाने के लिए पप्पू यादव से लेकर मुलायम सिंह तक सभी को काम पर लगा दिया है। ये आरोप है की ये दोनों नेता अलग से गठबंधन बनाकर बीजेपी की शह पर ही लड़ रहे हैं।
                   इसलिए कोई नही चाहता, और कम से कम बीजेपी तो कभी नही चाहती की भिहार चुनाव विकास के मुद्दे पर लड़ा जाये।

A Cartoon on Net Neutrality and Internet.org Discussion

The Hindu
A debate on net neutrality and internet.org is growing on. After prime minister Mr. Modi visited facebook head quarter this issue capture a big space on social media.

Monday, September 28, 2015

A cartoon on Modi in The Hindu, Internet and Mark Zuckerberg

 Facebook founder-CEO Mark Zuckerberg says it is most important for India to get the Net neutrality debate right, as it has the most number of unconnected people

‘We want everyone to be on the Internet’

 

Vyang -- डिजिटल इंडिया ( Digital India ) के फायदे

मुझे ये समझ में नही आ रहा की अब तक हमारे देश ने डिजिटल इंडिया के फायदों को क्यों नही समझा। अब जाकर हमे मालूम पड़ा है की भारत की सारी समस्याओं का समाधान तो डिजिटली हो सकता था तो फिर पिछली सरकारें दूसरी चीजों पर क्यों समय खराब करती रही। खैर देर आयद, दुरुस्त आयद। अब हम इस बात को समझ चुके हैं और जो नासमझ अब भी नही समझ पा रहे हैं उनको समझाने के लिए डिजिटल इंडिया के ये फायदे लिखने पड  रहे हैं।

                               १.  अब आपको जो  समस्या हो उसका समाधान आप डिजिटल इंडिया से कर सकते हैं। आप को किसी विभाग से कोई शिकायत है तो आपको शिकायत करने के लिए विभाग के दफ्तर जाने की कोई जरूरत नही है। आप उस विभाग की वेब साईट पर जाकर अपनी शिकायत दर्ज कर सकते हैं। आपको तुरंत आपका शिकायत नंबर मिलेगा। आप दो चार दिन के बाद उस नंबर से आपकी शिकायत की स्थिति देख सकते हैं। वहां आपको लगभग 15 दिन तो अंडर प्रोसेस लिखा मिलेगा और आपकी उम्मीद जिन्दा रहेगी। उसके बाद आपको जवाब मिलेगा की आपकी शिकायत संबंधित अधिकारी को भेज दी गयी है। शिकायत को अधिकारी तक पहुंचाने का जो काम डाक विभाग तीन दिन में करता था वो डिजिटली 15 दिन में हो जायेगा। उसके बाद आप जब स्थिति चैक करेंगे तो उसमे  " सॉल्व " लिखा आएगा। आप कुछ नही कर सकते। आप वेब साईट पर दिए गए फोन से इस बारे में जानकारी चाहेंगे तो जवाब आएगा की ये फोन नंबर उपलब्ध नही है। क्योंकि नई व्यवस्था में पुरानी परम्परा का पूरा ध्यान रखा गया है। वेब साईट बेसक इसी साल बनी है लेकिन उसमे टेलीफोन नंबर 10 साल पुराने दिए गए हैं। इस तरह आप डिजिटली अपनी समस्या का समाधान कर सकते हैं। जब साईट पर सॉल्व लिखा है तो आपको भी मान लेना चाहिए की समस्या सॉल्व हो चुकी है।

                               २. इसी डिजिटल इंडिया से देश के किसानो की समस्याओं का भी समाधान हो सकेगा। जिस किसान के यहां 20 मन आलू पैदा हुआ है वो गूगल पर सर्च कर सकता है की दुनिया के कौनसे देश में आलू की कीमत ज्यादा है। मान लो उसे पता चलता है की स्वीडन में आलू महंगा है तो वह अपने आलू को स्वीडन में बेच सकता है। गूगल द्वारा ही उसे एक्सपोर्ट लाइसेंस से लेकर बंदरगाह जैसी हर जानकारी मिल सकती है। जो किसान अब तक रो रहा था की आलू दो रूपये किलो भी नही बिक रहा है वो अब 200 रूपये किलो आलू बेच सकता है। इससे हमारे यहां किसान क्रान्ति हो जाएगी। अभी कुछ दिन पहले इसी तरह की कितनी क्रांतियाँ हमारे देश में हो चुकी हैं इसका जिक्र प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में किया ही था। इस तरह किसान पूरी दुनिया की मंडियों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकता है। उसने जो जनधन योजना में खाता खुलवा लिया था और उसमे भले ही एक रुपया ना डाला हो परन्तु वो नेट बैंकिंग से अपना बैलेंस चैक कर सकता है उसे इसके लिए पांच रूपये खर्च करके शहर जाने की जरूरत नही है वो गांव के साइबर कैफे में ये सेवा 20 रूपये घंटे के खर्चे पर प्राप्त कर सकता है। वरना वो ऑनलाइन सामान बेचने वाली साईट पर जाकर कम कीमत में कम्प्यूटर खरीद सकता है।

                                   ३. मजदूरों को भी इससे काफी लाभ होगा। जिस मजदूर के पास काम नही है वो गूगल पर सर्च कर सकता है की देश में कहाँ काम मिल सकता है। वो मनरेगा का भुगतान नही हुआ हो तो ऑनलाइन शिकायत कर सकता है लेकिन उसका तरीका वही होगा जो हमने ऊपर बताया है।

                                  ४. आपका बच्चा खो गया हो तो आप गूगल पर सर्च कर सकते हैं। किसी महिला के साथ बलात्कार हुआ हो और पुलिस कार्यवाही नही कर रही है तो वो बलात्कारी के साथ सेल्फ़ी लेकर सोशल मीडिया पर अपलोड कर सकती है। आपके नल में पानी नही आ रहा है तो भी आप गूगल पर सर्च करके पता लगा सकते हैं की कहां  तक पहुंचा। आपके यहां सुखा पड़ा है तो आप इंटरनेट पर पता लगा सकते हैं की आपके इलाके में कितने प्रतिशत बारिस कम हुई है। इसी तरह आपके बच्चे को स्कुल में एडमिशन नही मिल रहा है तो आप पता लगा सकते हैं की हमारे देश में स्कूलों और विद्यार्थिओं का अनुपात क्या है। इस तरह पुरे देश की समस्या हल हो सकती हैं। इंटरनेट पर हर चीज का इलाज मौजूद है।

                                    ५. इसका सबसे बड़ा फायदा ये है की आपको भले ही ये लगता हो की आपकी जिंदगी मुस्किल हो गयी है और सरकार काम नही कर रही है परन्तु आप टीवी पर प्रायोजित भीड़ को प्रधानमंत्री के नारे लगाते देख सकते हैं। आपके मुहल्ले के लोग सरकार के बारे में क्या राय रखते हैं उसकी बजाए आप ये देख सकते हैं की जुकेरबर्ग सरकार के बारे में क्या कह रहे हैं। आपकी राय कोई अमरीकियों की राय से ज्यादा वजन तो नही रखती। प्रधानमंत्री अपने ऊपर लगे आरोपों के बारे में संसद की बजाय विदेश में जाकर लोगों से पूछ सकते हैं की ए मेरे देश के लोगो, बताओ, क्या मेरे ऊपर कोई आरोप है ? अगर किसी ने गलती से भी कह दिया की है, तो इवेंट मैनेजमेंट कम्पनी का भुगतान रोक दिया जायेगा।

                                        ६. इस तकनीक का एक फायदा और है। प्रधानमंत्री डिजिटल तकनीक का उपयोग करके अंग्रेजी में फर्राटेदार भाषण पढ़ सकते हैं और किसी को मालूम भी नही पड़ेगा। आप खुश हो सकते हैं की प्रधानमंत्री कितनी अच्छी अंग्रेजी बोलते हैं। इससे आपके मन में और विदेशों में हमारे देश का रुतबा बढ़ता है। वैसे भी प्रधानमंत्री कह रहे हैं की पूरी दुनिया हमारा लोहा मान रही है इसलिए भले ही हमारा बनाया हुआ लोहा मार्किट में ना बिके हमे उसकी चिंता करने की जरूरत नही है।

                                   बस अब हम केवल गूगल पर ये सर्च कर रहे हैं की क्या भारत में होने वाले इलेक्सन में अमेरिकी वोट डाल सकते हैं ? एक बार इसका जवाब हाँ में मिल जाये फिर लोग लोकतंत्र, समाजवाद , समानता, भाईचारा, नागरिक अधिकार जैसी चीजों को गूगल पर ढूंढते ही रहेंगे।

Sunday, September 27, 2015

डिजिटल इंडिया पर प्रधानमंत्री मोदी का अमेरिका में भाषण

खबरी -- प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका में बोलते हुए दो महत्त्वपूर्ण बातें कही। 
१.      इंटरनेट कनेक्टिविटी पांचवां मौलिक अधिकार है। 
२.      इंटरनेट, सोशल मीडिया डिजिटल डेमोक्रेसी है। 

गप्पी --       तो क्या प्रधानमंत्री ये मान रहे हैं की गुजरात में बार बार इंटरनेट पर प्रतिबंध मौलिक अधिकारों और डेमोक्रेसी पर हमला है। 

क्या भाजपा ( BJP ) वाकई में आरएसएस ( RSS ) के एजेंडे पर काम कर रही है ?

भाजपा पर हमेशा से ये आरोप लगता रहा है की वो आरएसएस के गुप्त एजेंडे पर काम कर रही है। लेकिन इस बार आरोप गुप्त नही बल्कि खुले तौर पर आरएसएस के एजेंडे पर काम करने का है। भाजपा और आरएसएस ने कभी भी आपसी रिश्तों का खण्डन नही किया है बल्कि उसे स्वीकार किया है। लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद इन रिश्तों का खुल कर सामने आना इस आरोप को और ज्यादा सही होने को प्रमाणित करता है। यहां सवाल ये है की आरएसएस का वो एजेंडा आखिर है क्या जिसको लागु करने का लोग आरोप लगा रहे हैं और सारे रिश्तों की स्वीकारोक्ति के बावजूद भाजपा जिससे इंकार करती रही है।
                   आरएसएस एक हिन्दू उच्च जातियों का संगठन है जिसकी स्थापना आजादी से पहले हुई थी। परन्तु इसकी स्थापना आजादी की लड़ाई में किसी योगदान के लिए नही बल्कि भारत में हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के उद्देश्य से हुई थी। आरएसएस को अंग्रेजों से कोई तकलीफ नही थी इसलिए आरएसएस के सर संघ चालक गोलवरकर ने उस समय हिन्दुओं से ये आह्वान किया था की आजादी की लड़ाई में शामिल हो कर अपनी शक्ति और समय बर्बाद करने की कोई जरूरत नही है। और हिन्दुओं को अंग्रेजों से बड़े दुश्मन मुस्लिमों, ईसाईयों और कम्युनिष्टों के खिलाफ लड़ना चाहिए।
                    आरएसएस जिस हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करना चाहता है उसमे उसकी योजना मनु स्मृति के अनुसार बताये गए ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय और शूद्र की चार श्रेणियों में बंटे समाज की स्थापना करना है। इस समाज में दलितों और महिलाओं को कोई अधिकार नही होंगे और उसी तरह दूसरे धर्म को मानने वालों को भी कोई अधिकार नही होंगे। उसकी अवधारणा में लोकतंत्र कहीं फिट नही बैठता है। अब जरूरत इस बात की है की आखिर इसकी स्थापना के लिए कौनसे काम करने जरूरी होंगे।

                १. आजादी की लड़ाई में कोई भी हिस्सेदारी ना होने और इसे एक महान उपलब्धि के रूप में स्वीकार ना करने की समझ और उसके बाद आजादी की लड़ाई ने हमारे देश में जिन लोकतान्त्रिक और प्रगतिशील मूल्यों की स्थापना की थी वो सब आरएसएस के हमले के दायरे में हैं। ये मूल्य धर्मनिरपेक्षता, समानता और स्वतंत्रता के साथ सामाजिक न्याय के मूल्य थे। ये सभी मूल्य आरएसएस के मानस  में मौजूद हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा में फिट नही बैठते हैं।

                 २. इसलिए आरएसएस हमेशा ऐसे कार्यक्रमों और ब्यानो को बढ़ावा देती है जिससे हिन्दुओं और दूसरे धर्म के लोगों के बीच गहरी विभाजन रेखा खींची जा सके। वो इस काम को कभी भी ठंडा नही होने देना चाहती इसलिए उसके नेता कुछ ना कुछ ऐसे बयान देते रहते हैं जिससे हिन्दू और गैर हिन्दू हमेशा आमने सामने रहें। इस खाई को चौड़ा करने के लिए वो हर उस चीज और विविधता को मुद्दा बनाते हैं जो इन समुदायों के बीच में है , जैसे खाने पीने की आदतों में फर्क, कपड़ों और पहनावे में फर्क, पूजा पद्धति में फर्क, त्योहारों और धार्मिक मान्यताओं में फर्क। इसलिए आरएसएस सबसे पहले उस जगह हमला करता है जहां उसे ज्यादा लोगों का समर्थन मिलने की उम्मीद होती है और फिर आहिस्ता आहिस्ता एक एक कदम उसे आगे बढ़ाता रहता है। जैसे पहले उसने बीफ बैन को मुद्दा बनाया ताकि गाय के प्रति हिन्दुओं की भावनाओं को भुनाया जा सके फिर धीरे धीरे मीट बैन तक चले गए।

                   ३. आरएसएस के लोग ईद पर क़ुरबानी को भी मुद्दा बना रहे हैं जबकि हिन्दुओं के कितने मंदिरों में ही अब तक बलि की प्रथा जारी है। झारखंड से रोज डायन कहकर महिलाओं को मारने की खबरें आती हैं। पूरी दुनिया में मुस्लिम ईद पर क़ुरबानी देते हैं अब इस को भी विवाद का विषय बनाना उस बड़ी साजिश का ही हिस्सा है जिसमे कभी भी इस आग को ठंडा ना होने देने की बात है। आरएसएस को मालूम है की मुस्लिम कभी भी ईद पर क़ुरबानी की प्रथा को बंद करने की मांग को मान नही सकते। जिस जीव हत्या को बहाना बनाकर आरएसएस मुस्लिमो पर हमले कर रहा है तो उसे सभी तरह के पशुओं , मछलियों, मुर्गे, बकरे और सूअर इत्यादि सभी तरह के पशुओं के पालने पर प्रतिबंध लगाना होगा। साथ ही उसे सभी तरह के हिंसक जानवरों जैसे शेर इत्यादि को भी खत्म करना होगा क्योंकि वो सभी जीव हत्या के कारण हैं। लेकिन चूँकि हमला मुस्लिमो पर है इसलिए इस प्रतिबंध को मुस्लिमो की मान्यताओं, खाने की आदतों और काम धंधे तक ही सिमित रखना होगा। मीट बैन के लिए आरएसएस और बीजेपी ने इस बार जैन समुदाय को बहाना बनाया और तर्क दिया की चूँकि जैन समुदाय अल्पसंख्यक है इसलिए उसकी भावनाओं का भी सम्मान करना चाहिए। जब मुस्लिमो का सवाल आता है तब आरएसएस का तर्क होता है की उसे बहुमत की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए।

                          ४.आरएसएस ने मुस्लिमो के खिलाफ नफरत फ़ैलाने के अपने अभियान में शुरुआत उन मुगल हमलावरों से की जो भारत को लूटने के इरादे से आये थे और जिनसे भारतीय जनता के मन में नफरत का भाव था जैसे मोहम्मद गौरी और गजनी। धीरे धीरे ये उसे बढ़ाकर पुरे मध्यकाल तक ले आये लेकिन इसमें भी उन्होंने ओरंगजेब जैसे शासकों को सामने रखा। आज हालत ये है की वो भारतीय  इतिहास के महान शासकों जैसे अकबर और टीपू सुल्तान को भी देशद्रोही साबित करने पर तुले हैं। अब बात इससे भी आगे बढ़ चुकी है और यहां तक की उनका हमला पूरी तरह साम्प्रदायिक रूप ले चूका है और इसमें हर मुस्लिम शामिल है चाहे  वो उपराष्ट्रपति अहमद अंसारी ही क्यों ना हों। पूरी दुनिया में विभाजनकारी ताकतें इसी तरह आहिस्ता आहिस्ता अपने विरोध का दायरा बढ़ती हैं और अपने पैर फैलाती हैं।

                          ५. आजादी की लड़ाई के स्वतंत्रता, समाजवाद और भाईचारे जैसे मूल्यों पर हमला करने के लिए उन्होंने कांग्रेस के मौजूदा नेताओं को चुना। सोनिया के विदेशी मूल को मुद्दा बनाने के बाद पूरा गांधी परिवार उनके हमले के दायरे में आ गया। यहां तक की UPA सरकार के भृष्टाचार को भी उन्होंने गांधी परिवार पर व्यक्तिगत हमले के लिए प्रयोग किया। उसके बाद जवाहरलाल नेहरू पर हमला करने के लिए उन्होंने सरदार पटेल और नेहरू के मतभेदों को बढ़ा चढ़ा कर दिखाया। अब वो नेहरू पर हमला करने के लिए नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को मोहरा बना रहे हैं। ये हमला नेहरू पर नही बल्कि उन सभी मूल्यों पर है जो आरएसएस की राह में रोड़ा हैं। ये लोग नेहरू को बहाना बना कर उन सभी मूल्यों पर हमला कर रहे हैं। जबकि सच्चाई ये है की इनके खुद के पास नेहरू के कद के आसपास का तो छोडो उसके पांच प्रतिशत का भी कोई नेता नही है।

                          ६. आरएसएस को अपनी इस मुहीम में सबसे ज्यादा खतरा वामपंथियों से है। क्योंकि यही एक विचारधारा है जो आरएसएस को रोक सकती है। वामपंथियों से मतलब केवल राजनैतिक पार्टियां नही बल्कि वो सभी लोग हैं जो शिक्षा, साहित्य और कला के क्षेत्र में पुरे देश में फैले हुए हैं। इसलिए मोदी सरकार आने के तुरंत बाद उन्होंने सबसे तेज हमला हमारी शिक्षा व्यवस्था और शिक्षा, साहित्य और कला से जुड़े संस्थानों पर किया। सभी मुख्य संस्थानों में से काबिल लोगों को बाहर करके अपने तीसरे और चौथे दर्जे के लोगों को भरना शुरू किया। FTII से लेकर IIT और नेशनल बुक ट्रस्ट तक सारी नियुक्तियां और पुरे देश में शिक्षा के स्लैब्स को बदलने की मुहीम इसी का हिस्सा है। इन्होने भाषा को भी इस विभाजन का आधार बना दिया। अब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को नक्सलियों और ड्रग्स का अड्डा बताना और अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को राष्ट्रद्रोहियों का अड्डा बताना भी इसी हमले का हिस्सा है।

                              ७. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का ये बयान की हिन्दू धर्म ने कभी भी महिलाओं की बराबरी की बात नही की और बार बार ये दोहराना की महिलाओं की पहली जिम्मेदारी घर होती है या उसके संगठनो द्वारा वेलेंटाइन डे इत्यादि पर हमले करना, महिलाओं के प्रति आरएसएस की सोच और एजेंडे  को सामने लाता है। अब आरक्षण पर मोहन भागवत के लगातार बयान दलितों के प्रति उसकी सोच के परिचायक हैं। संघ अभी इन चीजों को लागु करने की स्थिति में नही है इसलिए इन पर एक आदमी बयान देता है और दूसरा खंडन करता है ताकि दोनों तरफ के लोगों को संकेत दिया जा सके। भारत के संविधान के जिन हिस्सों पर संघ को घोर आपत्ति है उसमे महिलाओं और दलितों की बराबरी वाले हिस्से शामिल हैं। ये बात भी किसी से छिपी नही  है की संघ ने तो संविधान की जगह मनु स्मृति लागु करने की मांग की थी।

                                और इन ऊपर के सभी कार्यक्रमों को मोदी सरकार पूरी तैयारी और जोर के साथ लागु कर रही है। बेसक अभी कुछ विदेशी निवेशकों को जाने वाले गलत संदेशों को रोकने के लिए और NDA में शामिल दूसरी पार्टियों को बेनकाब होने से बचाने के लिए प्रधानमंत्री कभी कभी कुछ अच्छी बातें भी कह देते हैं जो भरम फ़ैलाने के लिए जरूरी है लेकिन जमीन पर सब कुछ उसी तरह से लागु किया जा रहा है जो आरएसएस चाहती है। फिर इस बात में किसको संदेह रह जाता है की बीजेपी आरएसएस के एजेंडे पर काम कर रही है।

Friday, September 25, 2015

गुजरात सरकार की स्वावलंबन योजना और पटेल आरक्षण आंदोलन

गुजरात सरकार ने पटेलों के आरक्षण आंदोलन से निपटने के लिए अपनी बहुप्रचारित स्वावलंबन योजना की घोषणा कर दी। जैसा की अनुमान था आरक्षण आंदोलन करने वाले समुदाय ने इसको ख़ारिज कर दिया। लेकिन सवर्णो का एक वर्ग ऐसा भी है जिसने इसका स्वागत किया है। भाजपा के कार्यकर्ताओं ने हमेशा की तरह आँख मूंद कर नाचना शुरू कर दिया। सवाल ये है की क्या ये योजना आरक्षण की मांग करने वाले एक बड़े तबके की अपेक्षाओं को पूरा करती है ? ध्यान से देखा जाये तो ऐसा नही लगता।
                  निजीकरण और उदार नीतियों के कारण गुजरात में एक वर्ग ऐसा है जिसको काफी लाभ हुआ। सरकार ने जब सामाजिक सुरक्षा के कामो से अपने हाथ खिंच लिए तब इन क्षेत्रों में इस वर्ग ने अपने पैर फैलाये और भरपूर फायदा उठाया। इसका दूसरा पक्ष ये रहा की आम लोगों को सस्ते में उपलब्ध सामाजिक सुविधाएँ महंगे मूल्यों पर खरीदनी पड़ी। इससे एक तो उनकी आय पर इसका प्रभाव पड़ा दूसरी तरफ इससे जो रोजगार पैदा होना चाहिए था वो नही हुआ। यहां पर रोजगार के सवाल पर दो तरह की आलोचना है, एक तो गिनती में रोजगार कम हुए और दूसरे जो नौकरियां निजी क्षेत्र में पैदा भी हुई उनके वेतन और दूसरी सुविधाओं का स्तर बहुत ही नीचा था। सरकार ने सरकारी और ग्रांटेड स्कूलों और कालेजों में कोई बढ़ौतरी नही की और धीरे धीरे शिक्षा का लगभग पूरा क्षेत्र निजी हाथों में चला गया। निजी क्षेत्र में नौकरी करने वाले अध्यापकों को तीन-तीन, चार-चार हजार में नौकरी करनी पड़ी। सरकार ने भी खर्च घटाने के नाम पर ठेके पर अध्यापकों और दूसरे कर्मचारियों की भर्ती की जिनकी तनख्वाह सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन से भी कम रखी गयी। आहिस्ता आहिस्ता आजीविका  का ये स्रोत सूख गया। निजी क्षेत्र में पहले ही जीने लायक वेतन का अभाव था जिससे स्थिति ये पैदा हुई की बिजनेस के अलावा और कोई स्थान ऐसा नही बचा जिससे एक ठीक ठीक जीवन गुजारा जा सके। उसके बाद आई मंदी से  इस क्षेत्र में भी नए लोगों के लिए प्रवेश मुश्किल हो गया। खेती के संकट ने इसमें मिल कर उस वर्ग के लिए जो अब तक सुविधापूर्ण स्थिति में था हालात बिगाड़ दिए। जब हालात मुश्किल हुए तो इस वर्ग ने इसका इलाज आरक्षण में ढूंढने की कोशिश की।
                     इस आंदोलन से निपटने के लिए सरकार ने जो इलाज सामने रखा वो कोई काम करेगा इसमें शक है। सरकार ने इस पैकेज में जो घोषणाएं की उसका लाभ केवल 90 % से ऊपर अंक प्राप्त करने वाले और 450000 रूपये सालाना आय से कम आय वाले परिवारों को ही मिलेगा। इस शर्त के बाद लाभ मिलने वाले लोगों की संख्या बेहद कम हो जाएगी। सरकार कह रही है की ये 1000 करोड़ का पैकेज है। परन्तु अगर सरकार को इतना पैसा खर्च करना ही था तो उसे सरकारी स्कूलों और कालेजों की संख्या बढ़ाने पर करना चाहिए था जिससे रोजगार के भी नए अवसर पैदा होते और जनता के भी व्यापक हिस्से को उसका लाभ मिलता। बल्कि हो तो ये रहा है की सरकार ने जो एकाध जगह सीट बढ़ाने की घोषणा भी की है तो वहां  PPP मॉडल की बात कर रही है। दूसरा इस पैकेज में उसने नौकरियों की संख्या पर कुछ नही कहा है। और तो और जो सरकारी पद खाली पड़े हैं उनको भरने की भी कोई घोषणा नही की है। इसलिए इस पैकेज से आंदोलन करने वाले समुदाय को कोई संतुष्टि महसूस होगी ऐसा नही लगता।
                     निजीकरण की नीतियों ने जो संकट समाज में पैदा किया है अब उसका असर जमीन पर दिखाई देने लगा है। बिना इन नीतियों को बदले और बिना लोगों को राहत दिए केवल उत्सव मनाने से लोगों को संतुष्टि हो जाएगी लगता नही है।

Wednesday, September 23, 2015

Vyang -- आए दिन बिहार के ( Aaye Din Bihar Ke )

बिहार सुंदरी का स्वयंबर हो रहा है। पुरे देश से महारथी अपने पुरे जोश के साथ, मूछों को खिजाब लगाकर बिहार पहुंच रहे हैं। बिहार सुंदरी को लुभाने के लिए अलग अलग तोहफे और वायदों की भरमार लगी हुई है। मुझे महाभारत में द्रोपदी का स्वयंबर याद आ रहा है। उसमे ही आधा महाभारत तो हो गया था। इसमें भी आधा तो जरूर होगा। कुछ विशेषज्ञ तो पुरे महाभारत की उम्मीद कर रहे हैं। 
                           लोकतंत्र की सुंदरी वरमाला लिए बिहार के आँगन में खड़ी है। 
 ऊपर मछली घूम रही है। नीचे बड़े बड़े धनुर्धारी लक्ष्यवेध को तैयार खड़े हैं। एक बार फिर महारथी कर्ण अपने धनुष के साथ मौजूद हैं। पिछला घटनाक्रम उन्हें याद है इसलिए इस बार अर्जुन को सबक सिखाने की पूरी तैयारी है। धनुष लेकर आगे बढ़ते हैं। तभी पीछे से आवाज आती है, " पहला अवसर मेरा है। " अर्जुन व्यवस्था का प्रश्न उठाते हैं। दादी सफेद हो गयी है। पूरा परिवार साथ में मौजूद है लेकिन कृष्ण नही दिखाई दे रहे। 
        " क्योंकि मैं सूत पुत्र हूँ इसलिए ?" कर्ण मुस्कुराते हैं। क्योंकि कर्ण जानते हैं की समय बदल चूका है। अब सूत पुत्र होना अयोग्यता का नही बल्कि योग्यता का परिचायक माना जाता है। और कर्ण इस बात को दोहराने का कोई मौका नही छोड़ते। 
         " नही, सूत पुत्र तो मैं भी हूँ। गुजरात में हमारी जाती को सूत मन जाता है। और उससे भी आगे की बात ये है की मैंने तो चाय भी बेचीं है। सो एक गरीब के पुत्र को पहला अवसर मिलना ही चाहिए। " अर्जुन ने प्रतिवाद किया। 
           " लेकिन इससे ये पूछा जाये की ये स्वयंबर में किसके लिए भाग ले रहे हैं। खुद तो ये शादी कर नही सकते। और जिस तरह पिछली बार हुआ था की इनकी माता ने तुम्हे पांच-पांच पतियों की पत्नी बना दिया था। इस बार तो 20-25 दावेदार हैं। इसलिए इन्हे तो मौका ही नही मिलना चाहिए। इनसे कहा जाये की ये पहले दूल्हे का नाम बताये। " कर्ण ने ठीक वहां चोट की जो सबसे कमजोर जगह थी। 
            " लेकिन ये कर्ण तो विश्वास घाती है। मैंने इसे अंगदेश का राजा बनाया। ये सोचकर की ये पिछली बार की तरह मेरा साथ देगा। लेकिन इसने पाला बदल लिया। ऐसे विश्वास घाती को तो तुम किसी भी तरह नही चुन सकती। " अर्जुन ने अगला पासा फेंका। 
             " तुमने मुझे अंगदेश का राजा बनने में मेरी सहायता की लेकिन तुमने पिछली बार इस एक अहसान की कितनी बड़ी कीमत वसूल की थी मुझे याद है। तुमने मुझे मेरे ही भाइयों के खिलाफ लड़ने के लिए मजबूर किया। उस समय तुम दुर्योधन के रूप में थे। इस बार तो तुमने मुझे अंगदेश के राज्य से हटाने का पूरा प्रयास किया लेकिन वो तो अच्छा हुआ यादव मेरी मदद को आ गए। सो अब तुम्हारा कोई अहसान बचता नही है। इस बार यादव पिछली बार की तरह तुम्हारे साथ नही मेरे साथ हैं। " कर्ण ने हिसाब चुकता किया। 
              अब अर्जुन के पास दूसरा कोई बहाना बचता नही था सो उसने एकाएक कुछ याद करते हुए कहा ," हम तुम्हारे लिए लाखों करोड़ के गहने और दूसरी सामग्री लेकर आये हैं। अगर तुम हमारा वरण करोगी तो हम तुम्हे सोने से लाद देंगे। " अर्जुन के साथ आए राज्य के लेखाकार ने तुरंत एक सूची सामने कर दी। 
               " इन पर भरोसा मत करना द्रोपदी। ये जो लिस्ट लेकर आये हैं उसमे तुम्हारे पुश्तैनी गहनो को भी शामिल कर लिया है। ये वो गहने हैं जो सालों पहले तुम्हे उपहार में देने की घोषणा की जा चुकी है लेकिन दिए नही गए थे। इन पर तुम्हारा पूरा अधिकार है। ये धोखेबाजी अब नही चलेगी। " कर्ण ने सख्ती से इसका विरोध किया। 
                   लोकतंत्र की सुंदरी परेशान है। सभी तरफ से दावे किये जा रहे हैं। लेकिन कोई मछली पर निशाना नही लगा रहा। सारा फैसला बातों से ही करना चाहते हैं। उसने सिर ऊपर उठाया और घोषणा की। आप लोग इधर उधर की बातें मत करिये और मछली पर निशाना लगाइये। इसमें पहले पीछे का कोई सवाल नही है। अब हमारी समझ में सब आ चूका है। सबको मौका मिलेगा और जरूरी हुआ तो इसके कई दौर भी हो सकते हैं। हमने टेनिस में फैसले के लिए पांच-पांच दौर भी देखे हैं। हमने आयोग बनाया है और वो पूरी प्रतियोगिता संचालित करेगा। और ये मत समझना की इस प्रतियोगिता में तुम दोनों ही हो। बाहर और भी लोग है जो प्रतियोगिता में भाग लेने आये हैं। हो सकता है की उनमे एकलव्य भी हो। 
                       एकलव्य का नाम सुनकर अर्जुन और कर्ण दोनों के माथे पर पसीने की बुँदे छलछला आई। 

खबरी -- मुझे साठ के दशक की एक फिल्म याद आ रही है " आये दिन बहार के " और उसके एक गाने को यों भी गाया जा सकता है। " ये वादे जब तलक हकीकत बने, इंतजार, इंतजार, इंतजार करो "

             
        

Tuesday, September 22, 2015

Vyang -- दिल्ली पर हमले के लिए डेंगू के मच्छरों की मीटिंग


 डेंगू के मच्छरों की एक गुप्त मीटिंग दिल्ली के एक पॉस इलाके की पानी की खाली टंकी में हो रही थी। सुरक्षा का  पूरा ध्यान रक्खा गया था। यहां मीटिंग करने के पहले इस जगह की कई दिन रेकी की गयी थी और जब पूरा विश्वास हो गया तभी ये जगह फाइनल की गयी थी। इस मीटिंग में मच्छरों के एक बड़े केंद्रीय नेता पहुंच रहे थे। इस नेता  ने पूरा एक सत्र संसद भवन में गुजारा था।उसने अलग अलग पार्टियों के नेताओं का खून पीकर इंसान की फितरत को ठीक तरीके से समझा था और वही आज अपने अनुभव बाँटने यहां पहुंचे थे। सही समय पर मीटिंग शुरू हुई।
नेताजी ने बात शुरू की। " हम लोग मिलकर डेंगू का अगला बड़ा हमला दिल्ली पर ही करेंगे। क्योंकि सुरक्षा की दृष्टि से भी ये ज्यादा ठीक रहेगा। दूसरा फायदा ये होगा की दिल्ली पर हमला होने से हमे मीडिया कवरेज भी भरपूर मिलेगी। मैंने इतने दिन में ये अच्छी तरह जान लिया है की हमारे मीडिया के लोग दिल्ली से बाहर निकलने में बिलकुल दिलचस्पी नही रखते। वो ज्यादातर मुख्य समाचार यहीं बैठे बैठे बनाते हैं। फिर चाहे वो समाचार डेंगू का हो या सनी लिओन का। दूसरा फायदा ये है की यहां सरकार के तीनो विभाग आपस में इतनी बुरी तरह से लड़ रहे हैं की वो हमारे खिलाफ कोई असरदार फैसला ले ही नही सकते। सरकारें वैसे भी काम करने में कम ही विश्वास रखती हैं और यहां तो ये हालत है की अगर केजरीवाल कुछ करना चाहेंगे तो केंद्र की सरकार नही करने देगी और MCD कुछ करना चाहे तो केजरीवाल नही करने देंगे।
                    दूसरा कारण ये है की दिल्ली के स्वास्थ्य पर प्राइवेट हस्पतालों का कब्जा है। डेंगू के मरीज को आठ-दस दिन रखना  पड़ता है और उसमे कोई ओपरेसन वगैरा होता नही है तो बिल भी बहुत ज्यादा नही बन सकता। इसलिए ये हस्पताल इन मरीजों को रखेंगे नही। उन्हें तो ऐसे मरीज चाहियें जो चार-पांच दिन में चार-पांच लाख का बिल देकर बाहर हो जाएँ।
                      अगली बात ये है की इस बार डेंगू का हमला पॉस इलाकों में भी पूरी ताकत से होना चाहिए। क्योंकि इन इलाकों के लोग खुद कोई काम करने में विश्वास नही रखते। इस बार MCD उनके यहां मच्छर मारने आएगी नही और वो खुद मार सकते नही। इसलिए इन इलाकों को भी टारगेट किया जाये इससे मीडिया में भी अच्छी सुर्खियां बनेगी।
                      अब किसी को कोई सवाल पूछना हो तो पूछ सकता है। " ये कहकर उसने अपनी बात समाप्त की।
                लेकिन मरने वाले तो सभी आदमी ही होंगे। इसलिए सभी लोग कैसे इकट्ठे नही होंगे ? -- एक जवान मच्छर ने पूछा।
               नेताजी एकबार जोर से हँसे। फिर बोले ," तुम इन आदमियों को नही जानते। तुमने आदमियों के मुंह से ही ये बात हजारों बार सुनी होगी की आदमी ईश्वर की सबसे बढ़िया कृति है। फिर भी  आदमी भूख से मरते हैं , कपड़े नही हैं, घर नही हैं।  किसी दूसरे जानवर को आज तक भूखे सोते देखा है ? दुनिया के सभी प्राणियों में केवल आदमी ही है जो भूखा सोता है। और इसका कारण कोई दूसरा प्राणी नही है, खुद आदमी ही हैं जिन्होंने ऐसे हालात पैदा किये हैं की करोड़ों दूसरे आदमियों को भूखा सोना पड़ता है। मैं तो कहता हूँ की आदमी ने खुद को प्रकृति की सबसे निकृष्ट कृति बना लिया है। सो तुम उनकी एकता की बात मत करो और आराम से हमले की तैयारी करो। "
                लेकिन राजधानी पर हमले से बहुत जोर से बात मीडिया में आएगी और  वो तुरंत हमे मार डालेंगे। ----एक दूसरे मच्छर ने आशंका जताई।
               " कुछ नही होगा। हफ्तों तक वो एक दूसरे पर आरोप लगाते रहेंगे। बात ब्यायालय तक जाएगी। वो  नोटिस जारी करेगा। आरोप प्रत्यारोप का दौर जारी रहेगा और तब तक हमारा स्वाभाविक मरने का समय यानि सर्दी आ जाएगी। वो आरोप लगाते हुए जनता की अदालत में जाने की बात करेंगे और जनता बिस्तर पर पड़ी होगी। "  नेता जी ने मुस्कुराते हुए कहा।
                        और अगले दिन मच्छरों ने दिल्ली पर हमला कर दिया। और आदमी सचमुष वैसा ही कर रहे हैं जैसा मच्छरों के नेता ने कहा था।

Monday, September 21, 2015

Vyang -- अगर ऐसा ना होता तो ?

देखिये सब कुछ होने पर ही निर्भर है। और जैसा हुआ है वैसा ही होने पर निर्भर है। बातचीत में बहुत लोग सवाल उठाते हैं की अगर ऐसा ना होता तो ? राजनेता तो इसे काल्पनिक सवाल कहकर ख़ारिज कर देते हैं। लेकिन हमने सोचा की अगर कुछ चीजें नही हुई होती तो क्या होता ? इस पर विचार करने पर हमने पाया की अगर ऐसा ना होता तो कैसा होता ? जैसे ----
            अगर बिहार चुनाव सामने नही होता तो मोहन भागवत के आरक्षण वाले बयान पर बीजेपी की क्या पर्तिक्रिया होती ? तो हमने पाया की कुछ ऐसी होती। 
   बीजेपी प्रवक्ता रविशंकर प्रशाद , " मोहन भागवत  जी ने बिलकुल वाजिब सवाल उठाया है। और ये सवाल देश की सारी जनता उठा रही है। उन्होंने ये कहा है की जब 65 साल से आरक्षण लागु होने के पश्चात भी उसका फायदा नही हो रहा है तो उसे खत्म कर दिया जाना चाहिए। लेकिन विपक्ष बहस से भाग क्यों रहा है ? हमारा मानना है की अब समय आ गया है की आरक्षण पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए। "
            इसी तरह मान लो पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी नितीश से अलग नही हुए होते तो बीजेपी क्या कहती ?
           बीजेपी प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन , " नितीश को बिहार की जनता को इस बात का जवाब देना पड़ेगा की उन्होंने बिहार की जनता के सिर पर दो साल एक अक्षम आदमी को मुख्यमंत्री के तौर पर बैठा कर रक्खा। जो आदमी खुलेआम रिश्वत लेने की बात कबूल करता है और जिसने बिहार को गड्डे में धकेल दिया है उसके जिम्मेदार खुद नीतीश कुमार हैं और अब बिहार की जनता उन्हें इस बात का जवाब देगी। "
           और मान लो अगर नीतीश बीजेपी से अलग ही नही हुए होते तो बीजेपी क्या कहती ?
          बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा , " पिछले दस साल में माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी के नेतृत्व में हमने बिहार को बदहाली और पिछड़ेपन की दलदल से निकाल कर देश के सबसे ज्यादा तेजी से विकास करने वाले राज्यों में शामिल कर दिया है। पिछले दस साल में बिहार में विकास की जो गंगा बही है वो अन्धो को भी दिखाई दे सकती है और इस चुनाव में बिहार की जनता एक बार फिर माननीय नीतीश कुमार के नेतृत्व पर विश्वास जाहिर करेगी। "
              इसी तरह अगर केंद्र में UPA की सरकार होती और बीजेपी विपक्ष में होती तो GST बिल पर क्या कहती ?
           बीजेपी प्रवक्ता अरुण जेटली , " GST पर राज्यों को कुछ गंभीर चिंताएं हैं। और जब तक केंद्र सरकार राज्यों की चिंताओं का समाधान नही करती तब तक GST का समर्थन करना हमारे लिए मुश्किल होगा। और सरकार को इस पर जोर जबरदस्ती के बजाय विपक्ष को विश्वास में लेकर आगे बढ़ना चाहिए। केवल बहुमत के सहारे कानून पास करना लोकतंत्र के खिलाफ होता है। "
             मान लीजिये बीजेपी विपक्ष में होती और महंगाई के सवाल पर क्या बोलती ?
           बीजेपी प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी , " देश की जनता का महंगाई से बुरा हाल है। प्याज 100 रूपये किलो और दालें 150 रूपये किलो बिक रही हैं और सरकार महंगाई घटने के आंकड़े पेश कर रही है। सरकार को समझना चाहिए की आंकड़ों से लोगों का पेट नही भरता। "
              इसी तरह की और भी बहुत सी बातें हैं जो अगर नही हुई होती तो क्या होता ? हमने केवल कुछ ही चीजों की कल्पना की है।

महिलाओं सहित सभी दबे-कुचले लोगों का विरोधी है आरएसएस

हिन्दू धर्म की जिस सनातन परम्परा में आरएसएस विश्वास करता है उसमे सभी के लिए बराबरी का बाकायदा विरोध किया गया है। उसमे कुछ जातिओं को उच्च पायदान पर बिठाया गया है और बाकियों को उनकी सेवा में लगाया गया है। यही हाल महिलाओं का है। महिलाओं को अपनी जातिगत स्थिति का शिकार तो होना ही पड़ता है साथ ही साथ महिला होने का शिकार भी बनना पड़ता है। परन्तु लोकतंत्र और एक आदमी-एक वोट की मजबूरी ने आरएसएस को खुलकर कुछ बातें कहने से रोका हुआ है। फिर भी ये बातें उसके पदाधिकारियों के ब्यानो और आरएसएस के कार्यक्रमों से सामने आ जाती है। मोदी सरकार आने के बाद आरएसएस को लगने लगा है की अब सत्ता पर उसका पक्का कब्जा हो चूका है और वो आने वाले समय में इसे किसी ना किसी बहाने बनाये रख सकती है। इसलिए उसकी ये छिपी हुई इच्छाएं और एजेंडा सामने आने लगा है।
               कुछ दिन पहले खुद मोहन भागवत ने ये बात कहि है की हिन्दू धर्म में महिलाओं की बराबरी की बात नही कहि गयी है, बल्कि एकता की बात कहि गयी है। सभी विचारक पहले ये आरोप लगाते रहे हैं की आरएसएस महिला विरोधी संगठन है। इसके जवाब में आरएसएस हमेशा ये रुख अपनाती रही है की हम तो महिलाओं की पूजा करते हैं। और  में महिलाओं को देवी का स्थान दिया गया है। और वो बराबरी के सवाल पर साफ बच कर निकल जाता है। अब चूँकि उसकी सरकार केंद्र में है और उसी संविधान की शपथ लेकर शासन कर रही है जिसमे महिलाओं को बराबरी का दर्जा हासिल है तो उसे कुछ मामलों पर अपनी स्थिति थोड़ी बहुत साफ करनी पद रही है। संसद में महिला आरक्षण का बिल सालों से लटका हुआ है जिसे बीजेपी किसी भी कीमत पर पास नही करवाना चाहती। क्योंकि पार्टी में इस पर मतभेदों को छोड़ भी दिया जाये तो भी ये आरएसएस के सिद्धांतों के खिलाफ बैठता है। आरएसएस जिस उच्च जाती, और पुरुष प्रधान समाज का हिमायती है उसमे महिलाओं को बराबरी के अधिकार की बात कैसे की जा सकती है। इसलिए मोहन भागवत ने इस मामले पर अपनी स्थिति साफ कर दी है की हिन्दू धर्म न्हिलाओं की बराबरी की बात नही करता। अब हो सकता है उसके बीजेपी के कुछ नेता कहीं डैमेज कंट्रोल के लिए फिर महिलाओं की पूजा करने के उदाहरण दें। लेकिन पूजा तो हिंदू धर्म बंदरों, सांपों और गायों की भी करता है। इसके अलावा भी बहुत से जानवरों की पूजा करता है।  जानवरों की ही क्यों, पत्थरों की भी करता है। तो महिलाओं को भी क्या आरएसएस इन जानवरों और पत्थरों की श्रेणी में गिनती है। सही कहा जाये तो बिलकुल इसी श्रेणी में गिनती है। बाकि के सारे प्रोग्राम और नारे केवल दिखावटी चीजें हैं और समस्या को उलझाये रखने के साधन हैं। बीजेपी सरकार व्यवहार में ऐसा कोई भी फैसला नही लेगी जिसमे महिलाओं को बराबरी की हैसियत हासिल हो। हाँ, बेटी बचाओ जैसे नारे जरूर लगाती रहेगी।
                      दूसरा तबका दलितों और पिछड़ों का है। हिन्दू धर्म उनके बारे में क्या क्या कहता है ये तो सबको मालूम है। लेकिन उनकी संख्या और वोट की ताकत आरएसएस को व्ही सब बातें कहने से रोकती हैं जो हिन्दू धर्म ग्रंथों में कहि गयी हैं। उससे उनके मन में गहरे तक बैठी हुई उन बातों को खत्म तो नही किया जा सकता। दलितों, आदिवासियों और समाज के निचले वर्ग के लिए आरएसएस की भावनाएं व्ही हैं जो महाभारत में द्रोणाचार्य की थी। द्रोणाचार्य ने आदिवासी एकलव्य को शिष्य बनाने से तो इंकार किया ही था लेकिन जब वो खुद अपने प्रयासों से धनुर्विद्या सिख गया और द्रोण शिष्य अर्जुन से बेहतर धनुर्धारी हो गया तो गुरुदक्षिणा की दुहाई दे कर उसका अंगूठा भी कटवा दिया। उससे पहले जब रामायण में राम ब्राह्मणो के एक ग्रुप के कहने पर तपस्वी शूद्र शम्बूक का सर काट लेते हैं। रामायण में दलितों और महिलाओं पर अत्याचार के प्रसंग भरे पड़े हैं। वहां जब किसी दलित या आदिवासी का बखान भी किया गया है तो वो भी एक आदर्श सेवक की तरह किया गया है। अगर दलित या आदिवासी सेविकाई से बाहर पैर रखने की कोशिश करता है तो वो तब के ऋषियों को भी बर्दास्त नही होता था और अब आरएसएस को भी नही होता। इसलिए आहिस्ता आहिस्ता दिल की बातें जुबान पर आ रही हैं। मोहन भागवत का आरक्षण की समीक्षा करने का बयान इसी दलित विरोध का हिस्सा है। उससे पहले आरएसएस के प्रमुख पदाधिकारी अम.जी. वैद्य आरक्षण को खत्म करने की मांग कर चुके हैं। अब इस पर तरह तरह के तर्क दिए जायेंगे। आरएसएस जानती है की दलित और पिछड़ी राजनीती के कई सूरमा अब बीजेपी के सामने दण्डवत हैं और उनमे अपने निजी स्वार्थों के आगे अब समाज की लाभ हानि कोई मायने नही रखती। आरएसएस का एजेंडा आजादी के पहले से एक उच्च वर्गीय हिन्दू राज की स्थापना रहा है। इसलिए उस समय के आरएसएस के संघ चालक गोलवलकर ने हिन्दुओं को आजादी की लड़ाई से दूर रहने का आह्वान किया था।
                      इसलिए आने वाले समय में आरएसएस और बीजेपी अपने इस एजेंडे को लागु करने या आगे बढ़ाने की हरसम्भव कोशिश करेगी। समाज में ऐसा माहोल बनाया जायेगा जिसमे इन बातों का विरोध करने वालों को देशद्रोही घोषित किया जायेगा और समर्थन करने वालों को तठस्थ बुद्धिजीवी और महान विचारक की उपाधि दी जाएगी।

Sunday, September 20, 2015

हिंदी न्यूज चैनल और डेंगू का सवाल

कोई आदमी अगर भारत में नही रहता है और डेंगू के ऊपर भारतीय टीवी के हिंदी न्यूज चैनल के कार्यक्रम देखता है तो उसे डेंगू के बारे में जो कुछ समझ में आएगा वो इस प्रकार होगा।
१. भारत में केवल दिल्ली ही एक ऐसा राज्य और शहर है जहां डेंगू की बीमारी है।
२. दिल्ली में डेंगू ने महामारी का रूप ले लिया है और लोग मक्खियों की तरह मर रहे हैं।
३. दिल्ली में डेंगू की फलने की वजह मच्छर की बजाय केजरीवाल सरकार है।
४. जब दिल्ली में डेंगू की महामारी फ़ैल रही थी तब केजरीवाल सरकार को छोड़कर बाकि सब, यानि असली सरकार LG साहब , भाजपा शासित महानगर पालिका और केंद्र सरकार सब जी तोड़ मेहनत कर रहे थे।
५. दिल्ली में सरकारी हस्पतालों की हालत पहले बहुत अच्छी थी जो केजरीवाल के आने के बाद खराब हो गयी।
६. स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के लिए केजरीवाल सरकार जिम्मेदार है।
७. केजरीवाल सरकार ने ऐसा इंजेक्शन क्यों नही बनाया जो वो सभी प्राइवेट हस्पतालों को लगा दे और वो मुनाफा कमाना बंद करके जनसेवा में लग जाये।
८. केजरीवाल सरकार दिल्ली में प्राइवेट हस्पतालों का कानून बदल सकती थी भले ही उसे चपरासी नियुक्त करने का अधिकार ना हो।
९. दिल्ली में केजरीवाल का रहना कांग्रेस और बीजेपी के लिए डेंगू से ज्यादा खतरनाक है।
१०. अगर केंद्र सरकार स्वास्थ्य के बजट में कटौती करती है तो उसका कोई प्रभाव स्वास्थ्य सेवाओं पर नही पड़ता।
११. बीजेपी,  कांग्रेस, केन्द्र सरकार  और मीडिया का काम केवल टीवी चैनलों में बैठकर केजरीवाल को गालियां देने से पूरा हो जाता है।
१२. देश के बाकि राज्यों में डेंगू का कोई मरीज नही है, अव्वल तो वहां डेंगू के मच्छर ही नही हैं, क्योंकि ये सारे मच्छर मीडिया से पूछकर ही प्रदेशों में जाते हैं।
                      

Friday, September 18, 2015

Vyang -- " मन की बात " पर रोक क्यों लगाई जाये ?

खबरी -- चुनाव आयोग ने " मन की बात " पर रोक लगाने से इंकार कर दिया।

गप्पी -- असल में ये मांग ही गलत थी। चुनाव आयोग ने एकदम सही फैसला किया है। विपक्षी दलों का कहना था की प्रधानमंत्री की " मन की बात " से बिहार चुनाव में मतदाताओं पर असर पड़ेगा। लेकिन ये बात तथ्यों से परे है।
              मुझे नही लगता की " मन की बात " का कोई प्रभाव मतदाताओं पर पड़ता है। मतदाताओं पर केवल मुद्दे की बात का प्रभाव पड़ता है। और प्रधानमंत्रीजी का तो ये रिकार्ड रहा है की उन्होंने कभी मुद्दे की बात ही नही की। बल्कि अब तो ये भी साफ हो गया है की लोग जिन बातों को मुद्दे की बात समझ रहे थे वो भी मुद्दे की बात नही थी। अब इस बात का शक जताना की प्रधानमंत्री अपनी " मन की बात " में मुद्दे की बात कर सकते हैं ये विपक्षी दलों की गलत धारना है। इस बात के समर्थन में मैं और भी हजारों सबूत पेश कर सकता हूँ।
                जैसे संसद के पुरे सत्र के दौरान विपक्षी दलों ने अपनी सारी कोशिशें कर ली, लेकिन क्या वो प्रधानमंत्री से मुद्दे की बात पर एक शब्द बुलवा पाये। प्रधानमंत्री ने ना तो मुद्दे की बात की और ना ही मुद्दे पर बात की। फिर भी प्रधानमंत्री पर इस बात का शक करना तो चुनावी रणनीति ही माना जायेगा।
                   दूसरा चुनाव से पहले प्रधानमंत्रीजी ने जो जो बातें कहि थी आज इतने दिन के बाद भी उनमे से किसी में कोई मुद्दा निकला। सारे देश की जनता ने बारीक़ से बारीक़ छलनी लेकर सारी बातों को कई कई बार छान लिया की एकाध मुद्दा निकल ही जाये, लेकिन नही निकला।
                     एक और सबूत है जिसके बाद तो आपको मानना ही पड़ेगा की विपक्ष की मांग गलत थी। और यही सबसे महत्त्वपूर्ण बात है। जिन मुद्दों पर प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी काम कर रही है क्या उनका जिक्र उन्होंने कभी किया। मैं तो कहता हूँ की पुरे विपक्ष ने उन पर वो बात कहने के लिए दबाव डाला, जो वो कर रहे हैं लेकिन उन्होंने नही माना। दूसरी बात ये है की प्रधानमंत्री जी जिस संगठन यानि आरएसएस से आये हैं, उसका तो इतिहास रहा है की उसने उन बातों को कभी नही माना जिनके लिए वो सारी जिंदगी काम करता रहा। और जिन बातों का जिक्र वो अपनी बातों में करते रहे हैं उनको कभी उस तरह लागु नही किया। जैसे वो बात राष्ट्रवाद और देशभक्ति की करेंगे और काम देश तोड़ने के करेंगे। एकता के नाम पर उनके द्वारा किये गए किसी भी काम में अगर कुछ नही था तो बस एकता ही नही थी। वो देश की सुरक्षा के लिए कार्यक्रम घोषित करेंगे और देश जलने लगेगा। प्रधानमंत्री लोकतंत्र और कांग्रेस मुक्त भारत दोनों की बात एक साथ करते हैं। वो सहकारी संघवाद ( Cooperative Federalism ) की बात और नीतीश मुक्त बिहार की बात एक साथ करेंगे। अब कोई ये तो नही कह सकता की प्रधानमंत्री को इन बातों के मायने नही मालूम होंगे, बाकी तो फिर नियत की बात ही बचती है।  

                       इसलिए चुनाव आयोग का फैसला एकदम सही है। और विपक्ष को इस बात पर प्रधानमंत्री पर आरोप लगाने बंद कर देने चाहियें।

Thursday, September 17, 2015

Vyang - बिजनेस फ्रेंडली राज्य बनाने पर सुझाव

पिछले दिनों वर्ल्ड बैंक ने एक लिस्ट जारी की है जिसमे भारत में सबसे आसानी से बिजनेस किये जाने वाले राज्यों की सूचि जारी की है। मुझे बड़ा दुःख हुआ जब मैंने देखा की हमारे राज्य का नंबर तो झारखण्ड, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे पिछड़े हुए राज्यों के भी बाद आता है। सो मैंने इन सभी राज्यों में मिलने वाली सुविधाओं और सहूलियतों का गहन अध्धयन करने के बाद कुछ सुझाव तैयार किये हैं जिन्हे अपनाकर दूसरे राज्य भी इस सूची में अपना नंबर सुधार सकते हैं। ये सारे सुझाव एकदम मुफ्त में और बिना मांगे दिए जा रहे हैं और मैं उम्मीद करता हूँ की इन्हे अपनाने वाले राज्य मेरी सेवाओं का सम्मान करेंगे।
सिंगल विंडो स्कीम ------- 
                                       जब कोई आदमी किसी राज्य में बिजनेस शुरू करना चाहता है तो उसे अलग अलग कई विभागों से मंजूरी लेनी पड़ती है। सभी विभागों के अधिकारी काम करने के लिए सीधे सीधे पैसे लेने की बजाय दलालों की मार्फत पैसे लेते हैं। उन सभी अधिकारीयों के दलालों को ढूंढना काफी मुस्किल भी होता है और इसमें समय भी बहुत लगता है। इसलिए सरकार को एक सिंगल विंडो स्कीम पेश करनी चाहिए जिसमे एक ही दलाल सभी विभागों के अधिकारीयों का पैसा ले ले और बाद में अधिकारी और विभाग की हैसियत के हिसाब से बंटवारा कर दे। विकसित राज्यों में इन दलालों को सचिवालय के बाहर बैठने के लिए जगह दी गयी है जिससे इन्हे ढूंढने में कोई दिक्क़त नही हो। इस अनुभव का फायदा दूसरे राज्यों द्वारा भी उठाया जा सकता है।
खनन उद्योग माफिया के भरोसे --------
                                                          सरकार को ये पता लगाने के लिए की कहां  कहां खनन किया जा सकता है और कैसे किया जा सकता है बहुत खर्चा करना पड़ता है। फिर भी अधिकारीयों के भरोसे ये काम ठीक से नही हो पाता है। इसलिए इसमें निजी क्षेत्र की भूमिका को बढ़ावा दिया जाना चाहिए और पुरे खनन क्षेत्र को माफिया के भरोसे छोड़ देना चाहिए। ये साबित हो चूका है की माफिया खनन का विकास ज्यादा तेजी से करता है। सभी बिजनेस फ्रेंडली राज्यों ने खनन को माफिया के ही भरोसे छोड़ा हुआ है। अधिकारीयों का काम केवल उनसे पैसे लेकर ऊपर  तक पहुंचाना होता है। इससे सरकार का समय भी बचता है और नए नए क्षेत्रों में खनन का विकास भी तेजी से होता है।
व्हिसल ब्लोवरों पर लगाम --------
                                                   हर राज्य में कुछ विकास विरोधी लोग होते हैं जो सरकार और बिजनेस मैन के काम में अड़ंगा लगाते रहते हैं और अपने आप को व्हिसल ब्लोवर कहते हैं। विकास के हित में इन पर लगाम लगाई जानी बहुत जरूरी है। उनमे से दो-तीन को मार दिया जाये तो बाकि को धमकाना आसान हो जायेगा। हर विकास शील राज्य ने यही तरीका अपनाया है। उसके बाद ये समस्या धीरे धीरे कम हो जाती है। पुलिस को आदेश दिए जाएँ की अगर कोई व्हिसल ब्लोवर धमकी की शिकायत लेकर पुलिस के पास आये तो उसी पर ब्लैकमेल का मुकदमा बना दिया जाये।
श्रम विभाग को नया काम --------
                                                किसी भी राज्य में उद्योग के विकास के लिए ये जरूरी है की मजदूर कानूनो को संविधान के बाहर मान लिया जाये। हर बिजनेसमैन को ये छूट दी जाये की वो कितनी ही देर काम करवाये और कितना ही वेतन दे। इसके लिए सबसे अच्छा तरीका ये है की राज्य में ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा दिया जाये और मजदूर कानूनों को बदलने का झंझट लेने की बजाए उन पर ध्यान ना देने का रास्ता अपनाया जाये। यूनियनों पर प्रतिबंध लगा दिया जाये और श्रम विभाग का काम केवल ठेकेदारों का पता लगाकर उनसे पैसे इक्क्ठे करने तक सिमित कर दिया जाये। वैसे ज्यादा विकसित राज्यों में तो ये काम उद्योगपतियों के जिम्मे ही है की वो हर महीने ठेकेदारों के भुगतान में से पैसे काटकर विभाग में जमा करा दे। अब जब उनको प्रोविडेंट फंड और ईएसआई जमा करवाने से छुटकारा मिल गया है तो वो इतना काम तो राज्य की भलाई में कर ही सकते हैं।
टैक्स सुधारों को लागु करना ------
                                                   टैक्स सुधारों का मुद्दा इसमें काफी मायने रखता है। सरकार को पिछले दरवाजे से जो टैक्स आता है उसकी प्रगति पर कड़ी नजर रखी जानी चाहिए। बाकि खजाने में कितना टैक्स आता है उस की ज्यादा चिंता नही करनी चाहिए। उसमे अगर कमी आती है तो पट्रोल और डीजल पर टैक्स बढ़ाकर पूरा किया जा सकता है। पिछले दरवाजे से टैक्स देने वाले व्यापारियों को बही खातेचैक करवाने से छूट दी जाये। इससे जो सफेद धन को काला करने की प्रकिर्या है उसमे तेजी आएगी। इन टैक्स सुधारों को लागु करना बिजनेस फ्रेंडली राज्य बनाने के लिए बहुत जरूरी है।
विकास के प्रचार में तेजी -----
                                               इस उपलब्धि के लिए जो काम सबसे जरूरी है वो ये की विकास के प्रचार में तेजी लाई जाये। चाहे आदिवासियों के विस्थापन का सवाल हो, चाहे किसानो की जमीन छीनने का काम हो या पर्यावरण का सवाल हो, इनका विरोध करने वाले हर आदमी और संस्था को विकास विरोधी और बाद में देशद्रोही घोषित कर दिया जाये। उनके लाइसेंस रद्द कर दिए जाएँ और मीडिया हाउसों को इसकी खबरों पर बैन लगाने के आदेश दिए जाएँ। इन लोगों पर हमला इतना तेज किया जाये की जब तक लोगों को सच्चाई समझ में आये तब तक काम पूरा हो चुका हो।
                    ये कुछ सुझाव बहुत छानबीन और विचार करने के बाद तैयार किये गए हैं और राज्य इनसे लाभ उठा सकते हैं।

We are proud of you Mr. M.F. Hussain.

                                          We are proud to be an Indian with you.

Tuesday, September 15, 2015

अयलान ( Aylan )और अविनाश ( Avinash ) की मौत पर क्यों रोते हो।

अयलान कुर्दी और अविनाश एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आज उनकी मौत पर रोने वालों का ताँता लगा हुआ है। पूरी दुनिया के अख़बार अयलान की तस्वीरों से और पुरे भारत के अख़बार अविनाश की तस्वीरों से भरे पड़े हैं। लोग मातम करके अपना फर्ज निभा रहे हैं। सहायता की पेशकश हो रही हैं। परन्तु कौन थे ये अयलान और अविनाश ?
अयलान कुर्दी -- तीन साल की उम्र का बच्चा जो अपनी शरण ढूढ़ने के लिए भागती हुई माँ की गोद में छुपे छुपे और उसके साथ ही समुद्र में समा गया। अयलान एक कुर्दी था। कुर्द, एक ऐसी कौम जो सीरिया,इराक और तुर्की नाम के तीन देशों में बंटे क्षेत्र में और तीनो ही देशों में अल्पसंख्यक है। जिस पर इराकी फौजें भी हमले कर रही हैं, तुर्की फौजें भी और ISIS भी। कुर्द एक बहादुर कौम है। जब ISIS ने पुरे इराक और आधे सीरिया को रौंद दिया, और जो अमेरिकी अनिच्छा से किये गए हमलों के बावजूद आगे बढ़ते रहे, जिस पर अपने आप को शक्तिशाली कहलाने वाले और नाटो के सदस्य देश तुर्की के हमलों का कोई असर नही हुआ, उसे कुर्दों ने रोका। कुर्दों के क्षेत्र में घुसने पर ISIS को एक एक इंच जमीन के लिए नाक रगड़नी पड़ी। पूरी दुनिया में ISIS को किसी ने टककर  दी तो केवल कुर्दों ने दी। परन्तु एक तरफ ISIS, दूसरी तरफ तुर्की और तीसरी तरफ अमेरिकी और योरोपीय देशों के हमलों ने  कुर्दों के क्षेत्र को तबाह कर दिया। योरोपीय और अमेरिकी हमलों ने सीरिया को खंडहर में बदल दिया। लीबिया और इराक के बाद पश्चिमी लोकतंत्र का स्वाद अब सीरिया और यमन के हिस्से आ रहा है। और इस लोकतंत्र स्थापित करने के पश्चिमी तरीके ने लाखों लाख लोगों को अपनी जान बचाकर भागने पर मजबूर कर दिया। लोग हजारों मील का समुद्री रास्ता छोटी छोटी किश्तियों के सहारे तय करने निकल पड़े। इनमे से हजारों लोग बीच समुंद्र में समा गए। इन्ही में से एक अयलान कुर्दी भी था। उसकी लाश की फोटो जब अख़बारों में छपी तो योरोप के लोगों ने शरणार्थियों को शरण देने की मांग की। योरोप की सरकारों ने अपने उच्च मानवीय मूल्यों का हवाला दिया और उन लोगों को शरण देने की घोषणा की जो उनके ही कारण शरणार्थी बने हैं। इराक और सीरिया के विकसित देशों के लोगों को शरणार्थी बनने पर आखिर तो योरोप और अमेरिका ने ही तो मजबूर किया। और अब वही अयलान की मौत पर आंसू बहा  रहे हैं।
              युरोप और अमेरिका के लोग , जो इस मानवीय त्रासदी को पैदा करने वाली अपनी सरकारों के समर्थन में खड़े हैं उन्हें क्या हक है अयलान की मौत पर आंसू बहाने का। असल में तो ये लोग उसकी मौत के लिए जिम्मेदार हैं। उनकी जिन सरकारों ने ये सब किया उनको इन्होने ही तो चुना था। उनकी सारी अमानवीय और अंतर राष्ट्रिय नियमों को ताक पर रख कर की जाने वाली कार्यवाहियों को इनका समर्थन प्राप्त है।
अविनाश ------ दूसरी तरफ अविनाश है जो दिल्ली की सड़कों पर अपने माँ बाप की गोद में भागते भागते डेंगू का इलाज ढूढंते  ढूंढते मारा गया। उसकी मौत पर भी बहुत से लोग आंसू बहा  रहे हैं। आखिर अविनाश क्यों मरा ? स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र में भी घटते हुए सरकारी खर्च और मुनाफाखोरी को बढ़ावा दिए जाने के कारण अविनाश की मौत हुई। उसके माँ बाप कई दिन उसे उठाए उठाए हस्पतालों के चककर लगाते रहे परन्तु अपने बेटे के लिए इलाज नही खरीद पाये। अपने बेटे की मौत के बाद दोनों को ख़ुदकुशी इस मुनाफाखोर व्यवस्था के खिलाफ उनका विरोध है। उन्होंने इस व्यवस्था को ख़ारिज कर दिया है। अब केजरीवाल से लेकर नरेंद्र मोदी तक और सत्येन्द्र जैन से लेकर जे पी नड्डा तक, सब लोग इस पर घड़ियाली आंसू बहाते  रहें उससे क्या हो जाने वाला है। घड़ियाली इसलिए की क्या अब ये लोगों के स्वास्थ्य पर मुनाफा कमाने वाली प्रथा बदल दी जाएगी ? नही..  और इन सरकारों के समर्थन में खड़े बुद्धिविहीन तकनीकी रोबोट जो दुर्घटना का शिकार हुए आदमी की मदद करने से पहले उसका विडिओ बनाना जरूरी समझते हैं उनको भी इस पर आंसू बहाने का क्या हक है। सही मायने में तो वही लोग जिम्मेदार हैं इन घटनाओं के लिए जो इस मनुस्य विरोधी व्यवस्था का पोषण करने वालों के साथ सेल्फ़ी लेकर अपने आप को धन्य समझती है।
                 अयलान और अविनाश एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जिन्हे मानव विरोधी व्यवस्था ने एक को घर के अंदर मार दिया और दूसरे को घर के बाहर।

सयुंक्त राष्ट्र महासभा ( UNGC ) का प्रस्ताव और भारत की दावेदारी

कल सयुंक्त राष्ट्र महासभा ने सुरक्षा परिषद के विस्तार से संबंधित एक प्रस्ताव को मंजूरी दी। इस प्रस्ताव के सवाल पर भारतीय मीडिया में बहुत ही भ्रामक खबरें आ रही हैं और ऐसा दिखाया जा रहा है जैसे भारत को स्थाई सदस्यता मिलने जा रही है। जबकि इस मामले में दिल्ली ( न्यूयार्क ) अभी बहुत दूर है। कल जो प्रस्ताव पास हुआ है उसके मायने आखिर क्या हैं ?
                    भारत सहित कई देश दुनिया की बदली हुई परिस्थिति में सयुंक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विस्तार की मांग कर रहे थे। इन देशों में मुख्य रूप से चार देश शामिल हैं, भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील। परन्तु सुरक्षा परिषद के विस्तार का मुद्दा किसी निर्णय पर नही पहुंच पा  रहा था। सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य जिसमे अमेरिका, रूस, चीन, फ़्रांस और ब्रिटेन शामिल हैं इस को लटकाये रखना चाहते थे। ये देश हर रोज अपने भाषणो में अलग  अलग  बातें कहते रहे हैं। इस बातचीत को जिसे एक अंतर सरकार ग्रुप ( IGN ) चला रहा था 2008 से कोई प्रगति नही हो पा रही थी। इसलिए भारत सहित कई देशों ने इस बातचीत के लिए एक लिखित बातचीत ( पाठ  आधारित ) का प्रस्ताव रक्खा। इस प्रस्ताव के अनुसार तय किये गए पांच मुद्दों पर,     ( जिसमे वीटो पावर का मुद्दा भी शामिल है ) हर देश द्वारा लिखित पक्ष रखने को जरूरी किया गया। इस प्रस्ताव का उद्देश्य बातचीत को भाषणो और आश्वासनों से आगे बढ़ाने का था। P -5 के देशों ने इस प्रस्ताव पर नकारात्मक रुख रखा। उनके अलावा 13 देशों का एक समूह जिसमे पाकिस्तान. इटली और दक्षिणी कोरिया शामिल हैं, ने भी इसके खिलाफ रुख अपनाया।
               सयुंक्त राष्ट्र महासभा के नए अध्यक्ष सैम कुटेसा के आने के बाद और उनके प्रयासों से इसमें तेजी आई। सैम कुटेसा ने इस मामले पर अमेरिका, चीन और रूस द्वारा लिखे गए पत्रों को आम जनता के लिए जारी कर दिया जिसमे इस मामले पर उनका रुख साफ होता है।
अमेरिका का रुख -
                                अमेरिका ने इस विस्तार में किसी भी नए सदस्य को वीटो पावर का विरोध किया और पुराने सदस्यों की वीटो पावर जैसे की तैसे रखने की बात कही। अमेरिका का मानना है की कई देशों के पास वीटो पावर होने से सुरक्षा परिषद में किसी भी प्रस्ताव को पास करना मुश्किल हो जायेगा।
रूस का रुख ----
                        रूस ने रुख अपनाया की पहले के स्थाई सदस्यों के किसी भी अधिकार में ( वीटो पावर सहित ) कोई भी कटौती ना की जाये।
चीन का रुख -----
                          चीन ने सुरक्षा परिषद के विस्तार पर तो सहमति दिखाई परन्तु उसने कहा की नए स्थाई सदस्य बनाने की बजाए अस्थाई सदस्यों की संख्या बढ़ा दी जाये ताकि छोटे और मध्यम देशों को बारी बारी भूमिका निभाने का मौका मिल सके। व्यवहारिक रूप से चीन को भारत की सदस्यता की बजाय जापान की सदस्यता पर ज्यादा एतराज है जो उसका पारम्परिक विरोधी है।
                      लेकिन सैम कुटेसा के प्रयासों से इस प्रस्ताव पर सहमति बन गयी और सभी देशों ने सर्व सम्मति से ये प्रस्ताव पास कर दिया। अब आगे की बातचीत पाठ आधारित होगी और किसी नतीजे पर पहुंचना आसान होगा। इस प्रस्ताव के बाद ये उम्मीद बढ़ गयी है की सुरक्षा परिषद के विस्तार का लम्बे समय से लटका हुआ मुद्दा जल्दी हल होगा।
भारत की स्थिति ----
                               अभी जो बातचीत चल रही है वो इस मामले पर है की सुरक्षा परिषद के विस्तार का क्या रूप हो। उसमे कितने देशों को शामिल किया जाये। जो नए देश शामिल किये जाएँ वो स्थाई सदस्य हों या अस्थाई हों। अगर स्थाई सदस्य शामिल किये जाएँ तो उनके अधिकार क्या होंगे और क्या उनको वीटो का अधिकार दिया जायेगा या नही। एक बार इस मुद्दे पर सहमति बनने के बाद और विस्तार का फार्मूला तय हो जाने के बाद देशों की दावेदारी पर विचार करने का नंबर आएगा। इसलिए अभी इसे इस रूप में पेश करना की सयुंक्त राष्ट्र महासभा में भारत की दावेदारी पर विचार हो रहा है, गलत होगा। बात एक कदम आगे जरूर बढ़ी है लेकिन भारत के लिए अभी न्यूयार्क बहुत दूर है।

Monday, September 14, 2015

साधना( Spiritual practice) और तपस्या का संबंध तो केवल " स्वयं " " Self " से होता है।

जैन धर्म के साधना पर्व पर्युषण पर पुरे देश में एक अप्रिय विवाद खड़ा हो गया है। ये विवाद एक राजनैतिक पार्टी बीजेपी द्वारा अपने क्षुद्र हितों को साधने के लिए इसे विवाद में घसीटे जाने के चलते हुआ है। जैन समुदाय देश का एक छोटा और समृद्ध समुदाय है। हर साल इस पर्व के दौरान महाराष्ट्र में बूचड़खानों पर दो दिन की बंदी रहती थी। हालाँकि व्यापर और खानपान नागरिक अधिकारों का मसला है, उसके बावजूद राज्य के लोग जैन समुदाय की भावनाओं का आदर करते हुए ये बंदी रखते थे। इस बार बीजेपी ने कमिश्नर से मिलकर इसको बढ़ाकर चार दिन और मुंबई के एक  इलाके में आठ दिन कर दिया। जिस पर विवाद शुरू हो गया। इस विवाद में कई भड़काने वाली बातें कहि गयी और आखिर मुंबई उच्च न्यायालय ने इसे बिलकुल समाप्त करने का फैसला सुना दिया।
               सवाल ये उठता है की क्या बीजेपी ने एक छोटे समुदाय को बेवजह विवाद में नही घसीट दिया। इससे साथ में रहने वाले समुदायों के बीच में बिना वजह की कड़वाहट पैदा हुई। उसके इस काम में बीजेपी से संबंध रखने वाले जैन समुदाय के कुछ लोगों और मीडिया में नजर आने की लालसा रखने वाले कुछ साधुओं ने भी भूमिका निभाई। और आखिर में हुआ क्या, चौबे जी गए थे छब्बे जी बनने, दुबे जी होकर आ गए। लेकिन इस विवाद का असर दूरगामी रहेगा।
                दूसरा सवाल ये उठता है की साधना और तपस्या तो नितांत व्यक्तिगत मामला होता है। दूसरा कोई क्या करता है इसका कोई संबंध उससे नही होता। अलग अलग धर्मों को मानने वाले लोग इसके लिए अलग अलग तरीके अपनाते हैं। हर धर्म और मनुस्य का अपना तरीका होता है और कोई भी किसी द्वारा अपनाये गए तरीके को गलत नही ठहरा सकता। कबीर जी ( Kabir ) ने इस पर एकदम साफ बात कहि है।
               कबीरा तेरी झोंपड़ी गल कटियन के पास ,
               जिसकी करनी वे भरे, तू क्यूँ भया उदास।
         जैन धर्म के तीर्थंकरों ने भी इसके बारे में  साफ साफ कहा है। जैन धर्म जिस दर्शन में विश्वास करता है वो अनेकान्त दर्शन है। उसमे तो दुनिया के सारे विवादों पर मिटटी डालने की कोशिश की गयी है। उसमे कहा गया है की, " सत्य का कोई एक रूप नही हो सकता। जो मनुष्य जहां खड़ा होता है उसे वैसा ही सत्य दिखाई पड़ता है। इसलिए केवल अपने सत्य को मनवाने का आग्रह हिंसा है और असत्य है। " ये पूरी दुनिया के विवादों को खत्म करने का नुस्खा है लेकिन आज खुद उसके कुछ अनुयायी ही इसको भूल गए हैं।
                ऐसा केवल जैन धर्म में हो ऐसा नही है। सभी धर्मो में अपनी बातों को दूसरों से जबरदस्ती मनवाने की कोशिश हो रही है। धर्म में कहि गयी बातों की गलत व्याख्याएं की जा रही हैं। दूसरे धर्मो के लोगों को अधर्मी ठहराया जा रहा है। बड़े बड़े समारोह करके दूसरे धर्मो के विरुद्ध एलान किये जा रहे हैं। अपने नाम के आगे संत लगाने वाले जाने कितने लोग दूसरे धर्म पर विष वमन करते हैं,  और दंगों की भाषा बोलते हैं। धर्म के नाम पर राजनैतिक पार्टियां बन रही हैं, संगठन बन रहे हैं और लोगों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है।
                     इस्लाम के नाम पर बना ISIS तो बाकायदा इसके लिए युद्ध कर रहा है। और उसका ये युद्ध इस्लाम को मानने वाले लोगों के ही खिलाफ है। धर्म के नाम पर इसने रमजान  जैसे पवित्र महीने में छोटे छोटे बच्चों को इसलिए फांसी लगा दी की उन्होंने खाना खा लिया था। अगर ये धर्म है तो किसके लिए है। ये ना तो लोगों के लिए हो सकता है और ना ईश्वर के लिए हो सकता है।
                      इसलिए धर्म में बढ़ते वैरभाव और उसके राजनीती में घालमेल को रोकना आज और ज्यादा जरूरी हो गया है। मानवता की रक्षा करनी है तो धर्म के नाम पर राजनीती और अपनी बात को सही ठहराने की मंशा को रोकना ही होगा।

Sunday, September 13, 2015

ओपिनियन पोल (Opinion Polls ) का उपयोग भर्मित करने के लिए किया जाता है

जैसे ही चुनाव का मौसम आता है उसके साथ ही ओपिनियन पोल का मौसम भी आ जाता है। टीवी चैनलों से लेकर अख़बारों तक सभी जगह ओपिनियन पोल छाये रहते हैं। दो अलग अलग टीवी चैनलों के ओपिनियन पोल के रिजल्ट  में जमीन आसमान का अंतर हो सकता है। इसलिए इन ओपिनियन पोल पर  विवाद भी बहुत होता है।ओपिनियन पोल की कोई तकनीक हो सकती है लेकिन इस तकनीक का उपयोग केवल लोगों को भर्मित करने के लिए किया जाता है। चुनाव में बड़ी पैसे वाली पार्टियां अपने ओपिनियन पोल करवाती हैं और अपनी मर्जी के नतीजे टीवी पर दिखाए जाते हैं। इन पार्टियों को चूँकि कॉर्पोरेट का समर्थन होता है इसलिए मीडिया इसमें उनकी सहायता करता है।
                         जिस तरह ओपिनियन पोल करने की एक तकनीक होती है उसी तरह लोगों को भर्मित करने की भी तकनीक होती है और टीवी चैनल, ओपिनियन पोल करने वाली कंपनियां और कॉर्पोरेट समर्थित राजनैतिक पार्टिया इसी तकनीक का प्रयोग करती हैं।और ऐसा केवल भारत में हो ऐसा भी नही है। इसका इस्तेमाल पूरी दुनिया में होता है।
                        थोड़े दिन पहले ग्रीस में जनमत संग्रह हुआ था। वहां केवल दो ही तरह के वोट थे एक समर्थन करने वाले और दूसरे विरोध करने वाले। सभी ओपिनियन पोल करने वाली संस्थाएं यूरोपियन संघ का समर्थन करने वाले लोगों का बहुमत दिखाती थी। अंतिम दिन भी वो समर्थन करने वालों का वोट 1 % ज्यादा दिखा रही थी। नतीजा आया तो विरोध करने वाली वोटों का प्रतिशत 67 था। क्या दो तिहाई का अंतर और वो भी सीधे मुकाबले में, ओपिनियन पोल करने वालों को पता नही चला ? पता तो था लेकिन उनका काम तो लोगों को भर्मित करने का था जो वो अंतिम समय तक करते रहे।
                       दूसरा नजदीक का उदाहरण दिल्ली विधानसभा चुनाव का है। सभी ओपिनियन पोल बीजेपी को आगे दिखा रहे थे लेकिन नतीजे क्या आये सबको मालूम है।
                      कुछ दिन पहले एक स्टिंग ऑपरेशन आया था जिसमे इन ओपिनियन पोल करने वाली संस्थाओं को बाकायदा पैसे लेकर उस पार्टी के समर्थन में नतीजे देने की बात करते हुए दिखाया गया था। परन्तु टीवी चैनलों ने उस बात को दबा दिया क्योंकि उससे ना केवल ओपिनियन पोल करने वाली संस्थाओं की, बल्कि टीवी चैनलों की पोल भी खुलती थी। कॉरपोरेट मीडिया केवल पैसे लेकर ये काम करता हो ऐसा भी नही है। कॉर्पोरेट सेक्टर अपनी पसंददीदा पार्टियों को हमेशा दौड़ में आगे दिखाता है ताकि दूसरी पार्टियों के कार्यकर्ता हताश हो जाएँ। वोटरों का भी एक हिस्सा उसी को वोट देना पसंद करता है जो आगे होती हैं। उसका फायदा उठाने के लिए ये सारा खेल रचा जाता है।
                       इस काम को करने के लिए जो तरीका अपनाया जाता है वो इस प्रकार का होता है। जैसे दो दिन पहले आजतक पर एक ओपिनियन पोल आया है। उसमे बीजेपी को नितीश गठबंधन से 2 % ज्यादा वोट मिलता दिखाया गया है। इसके लिए उसे लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मिले वोटों में 19 % की बढ़ौतरी दिखानी पड़ी। पुरे देश में लोकसभा चुनाव के बाद जो भी विधानसभा चुनाव हुए हैं उनमे बीजेपी को मिलने वाले वोटों की संख्या में लोकसभा चुनाव के मुकाबले 10 से 12 % की गिरावट आई है। लोकसभा चुनाव में बीजेपी की लोकपिरयता अपने शिखर पर थी। उसके बावजूद ये ओपिनियन पोल उसमे 19 % की बढ़ौतरी दिखा रहा है।
                     जहां भी कॉर्पोरेट की सबसे पसंद दीदा पार्टी पीछे होती है ये ओपिनियन पोल उसे 1 या 2 % आगे दिखाते हैं। फिर कभी उसमे 2 % की बढ़ौतरी दिखा देते हैं और कभी 1 % की गिरावट दिखा देते हैं। दूसरा काम वो ये करते हैं की कॉर्पोरेट की धुर विरोधी वामपंथी पार्टियों जैसी पार्टी का ऑप्शन ही अपने पोल में नही रखते ताकि मतदाताओं को ये संदेश दिया जा सके की वो तो दौड़ में ही नही है। आखरी दिन तक भी  पार्टी की स्थिति नही सुधरती है तो अंतिम दिन उसे एकदम बराबर या 1 % पीछे दिखा देते हैं ताकि थोड़ी बहुत फेश सेविंग हो सके। बाद में जब रिजल्ट एकदम उसके उल्ट आता है तो शेयर बाजार की तरह उसकी दूसरी व्याख्या कर देते हैं।
                   इसलिए सचेत मतदाता को इन भर्मित करने वाले ओपिनियन पोल को देखकर राय बनाने से बचना चाहिए।

Friday, September 11, 2015

हमारी सरकार गरीबों की सरकार है---ये रहा हमारा प्लान

हमें ये बात बार बार दोहरानी पड़ती है क्योंकि अभी तक गरीब इस बात पर भरोसा ही नही करते। परन्तु हम जो कहते हैं वो करते हैं ये हमारा रिकार्ड रहा है। इसलिए जब हमने कह दिया की हमारी सरकार गरीबों की सरकार है तो गरीबों को हम पर भरोसा करना चाहिए। हम उन्हें ताकत देना चाहते हैं। कुछ लोगों को ये हजम नही हो रहा की कैसे एक चायवाला प्रधानमंत्री बन गया। लेकिन हम हर कीमत पर गरीबों को ताकत देकर रहेंगे। ऐसा मैंने अपनी लगभग हर रैली में कहा है। आज मैं अपना प्लान लोगों के सामने रखूंगा ताकि उन्हें हमारी ईमानदारी और वायदों पर भरोसा हो सके। गरीबों को ताकत देने का हमारा प्लान इस प्रकार है।
ताकत का मतलब है संख्या -------- 
                                                          हम ये मान कर चलते हैं की किसी भी तबके की ताकत उसकी संख्या पर निर्भर करती है। हमारा दल आरएसएस का हिस्सा है इसलिए हम हिन्दुओं के हितों का खास ख्याल रखते हैं। कुछ लोग तो यहां तक भी कहते हैं की हम केवल हिन्दुओं के हितों का ही ख्याल रखते हैं। कुछ लोग ये भी कहते हैं की हम केवल हिन्दू हित की बात करते हैं और असलियत में हम केवल कुछ उच्च जाती के हिन्दुओं का ही ख्याल रखते हैं। पर ये सच नही है। इस देश में लाखों हिन्दू किसानो ने आत्महत्या कर ली पर हमने कुछ नही किया, लाखों हिन्दू नौजवान रोजगार के लिए धक्के खा रहे हैं लेकिन हमने कुछ नही किया और हजारों हिन्दू भुखमरी से मर रहे हैं पर हमारे कानो पर जूं भी नही रेंगी। ये सब आरोप हैं। हमने इस पर जो जो किया वो मैं आपके सामने रखता हूँ। जैसे ही हिन्दुओं की संख्या 80 % से 1 % नीचे आई हमने कितनी हाय तौबा मचाई आपने देखा ही होगा। हमने हिन्दुओं की जनसंख्या बढ़ाने के लिए हेल्पलाइन तक शुरू करने की बात कही । हम मानते हैं की भले ही हिन्दू कितनी ही बुरी हालत में रहें लेकिन उनकी संख्या नही घटनी चाहिए। यही समझ हमारी गरीबों के प्रति है। हमारा हर कदम गरीबों की संख्या बढ़ाने पर लगा हुआ है। हमारी सरकार आने के बाद बेरोजगारी का प्रतिशत 9 से बढ़कर 17 हो गया इस पर किसी ने ध्यान दिया। इससे गरीबों की संख्या में कितनी बढ़ौतरी हुई होगी और गरीबों की ताकत में कितनी बढ़ौतरी हुई होगी ये देखा किसी ने। हमने गरीबों की संख्या में कमी करने वाले पहले से चले आ रहे मनरेगा जैसे कार्यक्रमों का क्या हाल कर दिया ये देखा किसी ने। हम गरीबों को ताकत दे रहे हैं बिलकुल हिन्दुओं की तर्ज पर, और ये हमारे विरोधियों से बर्दाश्त नही होता।
                           हम गरीबों को ताकत देने के लिए जो प्रयास करते हैं उसका ढिंढोरा नही पीटते। हमारे हर कार्यक्रम को अगर आप ध्यान से देखोगे तो हर कार्यक्रम में गरीबों को ताकत देने और उनकी संख्या बढ़ाने पर हमारा जोर रहा है। हम जब उद्योगपतियों की मीटिंग बुलाते हैं तो उनको भी इसके लिए प्रेरित करते हैं की वो गरीबों की संख्या बढ़ाने और उन्हें ताकत देने के काम में सरकार का सहयोग करें। हालाँकि हम ये भी जानते हैं की उद्योग जगत इस पर पहले से ही बहुत योगदान कर रहा है।
                          हमने प्याज जैसी चीज 90 रूपये किलो बिकवा दी कोई अनुमान कर सकता था ? जब हम दाल 150 रूपये किलो बिकवाते हैं तो उसके पीछे भी हमारा उद्देश्य गरीबों को ताकत देने का ही होता है। और हम ये ताकत देते रहेंगे। हमारी सरकार अपने मिशन से पीछे नही हटेगी। जो लोग इसमें अड़ंगा डाल रहे हैं उन्हें हम कामयाब नही होने देंगे। हम इस देश के सभी हिन्दुओं और सभी गरीबों को ताकत दे कर रहेंगे। बल्कि सही तरीके से कहा जाये तो हम हिन्दुओं और गरीबों के बीच का फासला ही मिटा देंगे। हमारी सलाह के अनुसार अगर हिन्दू अपनी आबादी बढ़ाने जैसे काम करते रहेंगे तो ये फासला बहुत जल्दी मिट जायेगा।
                           अभी हमने देश के पूर्वी हिस्से पर फोकस किया है। मैंने कहा है की जब तक पूर्वी भारत का विकास नही होगा बाकि देश का विकास नही हो सकता। ऐसा इसलिए कहा है क्योंकि पूर्वी हिस्से में गरीबों की तादाद पहले ही ज्यादा है और उसके कारण भी हमारे से पहले ही मौजूद हैं। वहां गरीबों की संख्या और ताकत को बढ़ाना बाकि देश की अपेक्षा ज्यादा आसान है। इसलिए गरीबों को ताकत देने का हमारा मिशन बिहार अब पुरे जोर शोर से शुरू होने वाला है। हमारी हर हिन्दू और हर गरीब से ये विनती है की वो विरोधियों की बात पर ध्यान ना दें। ये सरकार आपको ताकत दे कर रहेगी।

Thursday, September 10, 2015

लोकतंत्र की उलटी गिनती शुरू

            बीजेपी के मातृ संगठन आरएसएस का विश्वास कभी भी लोकतंत्र में नही रहा। इसलिए वो अपने सारे आदर्श राजतंत्र में ढूंढती है। यहां तक की जब नेपाल में राजतंत्र को खत्म करके लोकतंत्र की स्थापना हुई तो आरएसएस ने इस पर नाखुशी और चिंता जाहिर की थी। आरएसएस जिन तबकों का प्रतिनिधित्व करता है उनमे सामंती और साम्प्रदायिक तबकों का बहुमत है। इसलिए वो हमेशा लोकतान्त्रिक संस्थाओं के खिलफ रहता है और जब भी मौका मिलता है उन पर हमला करता है। वो अलग बात है की हमला करते वक्त वो कोई दूसरा बहाना बनाता है। वो समान सिविल कानून की बात करता है लेकिन हर आदमी को अपनी पसंद के अनुसार भोजन, पहनावा, भाषा और रहन सहन  की आजादी के खिलाफ है। उसके लिए समान कानून का मतलब है सब कुछ उसके अनुसार।
       हरियाणा का कानून -------
                                                   अभी-अभी हरियाणा की बीजेपी शासित सरकार ने स्थानीय संस्थाओं के चुनाव के लिए खड़े होने वाले उम्मीदवारों के लिए कुछ शर्तें लगा दी। जाहिर है की ये उनके लोकतान्त्रिक अधिकारों पर हमला था इसलिए कुछ लोगों ने उसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगाते हुए सरकार को नोटिस जारी कर दिया। सरकार को मालूम था की वो इसे न्यायालय में सही साबित नही कर पायेगी तो उसने इसका कानून विधानसभा में सारे विपक्ष के विरोध के बावजूद पास करवा दिया और रात को ही उसे राजयपाल से मंजूरी दिलवा कर सुबह चुनाव आयोग से चुनावों की घोषणा  करवा दी। ये सारा काम इतनी जल्दी में इस तरह प्लान किया गया की किसी को फिर से इसे न्यायालय में चुनौती देने का समय न मिले।
कानून का असर ---------------
                                               इस कानून में चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों पर न्यूनतम शिक्षा प्रमाणपत्र की शर्त लगा दी। हालाँकि इस तरह की शर्त साफ तौर पर एक बड़े तबके को चुने जाने से रोकने के लिए ही लगाई गयी है और खुल्ल्म खुल्ला उनके लोकतान्त्रिक अधिकारों के खिलाफ है। इस शर्त का असर ये हुआ की चुनाव लड़ने की इच्छुक सामान्य श्रेणी की 72 % और अनुसूचित जाती की 82 % महिलाये इससे बाहर हो गयी। इसी तरह बहुत से पुरुष उम्मीदवार भी चुनाव लड़ने के अयोग्य हो गए।
एक व्यक्ति-एक वोट का सिद्धांत ---------
                                                              पूरी दुनिया में हर आदमी को वोट देने का अधिकार हमेशा से नही था। पहले तो राजा की संतान ही राजा होती थी। उसके बाद जब इस व्यवस्था को पलट दिया गया तब उच्च स्थिति वाले तबकों ने आम जनता को वोट के अधिकार से वंचित रखने के लिए, वोट के अधिकार के लिए एक न्यूनतम सम्पत्ति होने, या फिर न्यनतम शिक्षा प्राप्त होने की शर्त लगा दी। इससे जनता का बहुमत वोट के अधिकार से बाहर हो गया और घूमफिर कर सत्ता फिर उच्च वर्ग के हाथ में रह गयी। अमेरिका में तो इस कानून के अनुसार अगर किसी आदमी की सम्पत्ति दो राज्यों में है तो वह दोनों जगह वोट का अधिकार रखता था। महिलाओं को वोट देने के अधिकार से वंचित रखा गया। आगे चल कर आम लोगों ने जब इस भेदभाव पूर्ण व्यवस्था का विरोध किया और इसके लिए संघर्ष किया तब कहीं जा कर एक व्यक्ति-एक वोट की  व्यवस्था को लागु करवाया। एक व्यक्ति-एक वोट का लागु होना लोकतंत्र के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ। अब हर आदमी की वोट की कीमत बराबर मानी  जाने लगी। मुकेश अम्बानी और उसका चपरासी, दोनों के वोट की कीमत एक जैसी हो गयी। उच्च वर्गों के लिए ये कोई आसानी से हजम होने वाली बात नही थी। इसी अधिकार के मुताबिक वोट देने के साथ साथ चुने जाने का अधिकार भी जुड़ा हुआ है।
बीजेपी और आरएसएस ------------
                                                      आरएसएस, जो वर्ण व्यवस्था में विश्वास रखती है ये बात कभी मान ही नही सकती की एक अछूत या एक महिला या फिर एक मजदूर चुनाव जीतकर शासन में बैठे। आज भी इस तरह के उदाहरण मिल जाते हैं जहां बड़ी जमीनो के मालिक अनुसूचित जाती के लिए आरक्षित सीट पर अपने यहां काम करने वाले मजदूर को चुनाव जितवाकर खुद उस पद का उपयोग करते रहते हैं। बराबरी की ये व्यवस्था आरएसएस और उसकी राजनैतिक पांख बीजेपी को कभी मंजूर नही हुई। लेकिन लोगों में इसकी स्वीकार्यता को देखते हुए उसकी हिम्मत उसे सीधे सीधे चुनौती देने की नही हुई। इसलिए उसने पिछले रस्ते से इस पर सीमाएं लगानी शुरू की। आज उसने चुने जाने के खिलाफ न्यूनतम शिक्षा की सीमा लगाई है बाद में इसे वोट देने तक भी बढ़ाया जा सकता है।
उलटी गिनती --------------
                                          सही मायने में ये लोकतंत्र की उलटी गिनती है। लोकतंत्र के प्रति बीजेपी की हिकारत उसके सभी कामों में नजर आती है। पार्लियामेंट में विपक्ष के खिलाफ उसका रुख, राज्य सभा के बारे में अरुण जेटली का बयान, प्रधानमंत्री का संसद में इतने बड़े गतिरोध के बावजूद सर्वदलीय मीटिंग में ना आना, संसद को बाईपास करके दूसरे तरीकों  से कानूनो को लागु करने की कोशिश करना इत्यादि ये सब लोकतंत्र के प्रति उसकी हिकारत को ही प्रकट करते हैं। आज हमारे देश में तानाशाही का खतरा सही मायने में तो 1975 से भी ज्यादा है। इसलिए लोकतंत्र की इस उलटी गिनती को रोका  जाना चाहिए।

Monday, September 7, 2015

रिमोट से संचालित लोकतंत्र की सेल

आज के सभी बड़े अख़बारों में डैमोक्रेसी की सेल की खबरें छपी थी। शहर के एक प्रमुख मॉल में डैमोक्रेसी की सेल लगी हुई थी और वह भारी डिस्काउंट पर मिल रही थी। हमने भी डैमोक्रेसी के बारे में बहुत सुना था और उससे हमे भी इच्छा हुई की एक डैमोक्रेसी हम भी ले आये तो अच्छा रहेगा। हम घर से निकलने ही वाले थे की हमारी पत्नी ने कहा की अगर रँग वगैरा अच्छा हो तो एक डैमोक्रेसी उसके लिए भी ले आये। लेकिन उससे पहले दुकानदार से ये पक्का कर लें की अगर पसंद नही आई तो वापिस देंगे। पता नही मेरी पत्नी डैमोक्रेसी को क्या समझ रही थी। परन्तु समस्या ये थी की ठीक ठीक हमे भी मालूम नही था की ये कैसी होती है। थोड़ी देर में हम बाजार में पहुंच गए। बहुत लोग आये हुए थे। सबमे एक अजीब सी ख़ुशी थी। काउन्टर पर खड़ा हुआ एक आदमी सबसे बात कर रहा था। मैंने भी जाकर आहिस्ता से डरते डरते कहा की भाई साब अगर आप ठीक समझें तो हमारे लायक भी एक डेमोक्रेसी दिखा दीजिये।
               सेल्समैन उत्साह में था। तुरंत बोला, " अरे आप लायक की क्या बात करते हैं, हमारे पास तो डेमोक्रेसी के इतने डिजाइन हैं की आपको कोई न कोई तो जरूर पसंद आएगा। हमारे पास दस तरह की तो इम्पोर्टिड डेमोक्रेसी है। ये देखिये अमेरिकी डिजाइन, इसमें आपको बहुत ही ज्यादा फैसलिटी मिलेगी। और हमारे पास तो रिमोट वाली डेमोक्रेसी के भी कई डिजाइन हैं। "
                  रिमोट वाली डेमोक्रेसी ? मैंने आश्चर्य प्रकट किया।
              बिलकुल! और ये डेमोक्रेसी तो हम कई साल से बेच रहे हैं। कोई शिकायत नही है। बस आपको इसका रिमोट हर रोज चार्ज करना पड़ेगा वरना वो काम नही करेगा। हमने ये डेमोक्रेसी बाला साहेब ठाकरे को बेचीं थी, जब तक वो रहे वो इसको रोज चार्ज करते रहे। उनके जाने के बाद ठीक से चार्ज  नही हुआ तो प्रॉब्लम हो गयी।
                क्या कोई भारतीय पीस नही है ? मैंने पूछा।
             हैं, हैं क्यों नही, ये जातीय डेमोक्रेसी है। दूसरी जो आजकल बहुत चल रही है वो रिमोट वाली सनातन डेमोक्रेसी है जो हमने अभी अभी आरएसएस को बेचीं थी। हमने उसका डेमो भी दिया था अभी संघ मुख्यालय में। हर बटन पर सरकार नाच रही थी। खुद भागवत जी ने इसकी तारीफ की है आपने अख़बारों में तो पढ़ा ही होगा। सेल्समैन ने पूरी जानकारी दी।
               दूसरा कोई मॉडल ? मैंने और जानकारी चाही।
        एक मॉडल और था रिमोट वाला जो हमने 10 जनपथ को बेचा था। ठीक काम कर रहा था लेकिन पता नही क्या हुआ कम्पनी ने उसे वापिस ले लिया। सेल्समैन ने निराशा प्रकट की।
               कोई एकदम नया माडल, अच्छे रिमोट के साथ ? मैंने उसके साथ साथ  चलते हुए कहा।
               है लेकिन बहुत महंगा है। अभी अमित शाह लेकर गए हैं। इसका रिमोट दूसरे लोगों पर भी काम करता है। उसे हम सीबीआई डेमोक्रेसी  कहते हैं। उसका डेमो हमने मुलायम सिंह पर दिया था एकदम कामयाब रहा। सेल्समैन ने मेरी हालत पर नजर डाली।
               तभी एक दूसरा ग्राहक आया। सेल्समैन ने उससे पूछा, " कहां से आये हो भाई ?"
                " बिहार से। "
               " अरे, आओ आओ, बिहार के लिए तो हमने स्पेशल स्कीम निकाली है। " सेल्समैन मुझे छोड़कर उसकी तरफ लपका।
                " ये देखो, ये जो डेमोक्रेसी हम बिहार में बेच रहे हैं उसके साथ एक स्पेशल गिफ्ट पैकेज भी दिया जा रहा है। शर्त बस ये है की आपको डेमोक्रेसी अभी खरीदनी पड़ेगी और गिफ्ट पैकेज आपको चुनाव के बाद भेजा जायेगा। " सेल्समैन ने उसे एक पीस दिखाते हुए कहा।
               " लेकिन इस गिफ्ट पैकेज में क्या है ?" उसने पूछा।
              " देखिये ये तो सरपाईज है। इसमें कुछ भी निकल सकता है, हो सकता है 15 लाख निकल जाएँ। " सेल्समैन ने कहा।
              लेकिन बिहारी भी पक्का बिहारी था, उसको बिना देखे भरोसा नही हो रहा था। उसने कहा की पहले पैकेज खोल कर दिखाओ तभी डेमोक्रेसी लेंगे। और वह चला गया।
              " तो तुम दिखा क्यों नही देते ? इस तरह तो तुम्हारा एक भी पीस नही बिकेगा। " मैंने सेल्समैन से कहा।
              " कैसे दिखा दूँ साहब, इसमें प्रधानमंत्री के विदेशी दौरों की कैसेट हो सकती है, योग सिखाने वाली किताब हो सकती है, प्रधानमंत्री द्वारा ली गयी सैलफ़ियों का संग्रह हो सकता है। और---" सेल्समैन बीच में ही रुक गया।
             "और " मैंने पूछा।
            " जुमला भी हो सकता है। " सेल्समैन वापिस मुड़ गया।

Sunday, September 6, 2015

गरीब को और गरीब बनाने का हथियार है हमारी टैक्स व्यवस्था


किसी भी देश की व्यवस्था को चलाने के लिए पैसे की जरूरत  होती है। और ये पैसा सरकार के पास टैक्स के द्वारा आता है। परन्तु सारी राजनीती इस बात पर निर्भर करती है की टैक्स इकट्ठा किससे  किया जा  रहा है और खर्च किस पर किया जा रहा है। लेकिन ये मामला इतना आसान नही होता। इसलिए इस बारे में एक भ्रम का जाल फैलाया जाता है। दुनिया की बड़ी से बड़ी एकतरफा व्यवस्था भी इसका भ्रम फैलाती है की वो सारे नागरिकों की भलाई के लिए काम कर रही है। इसका प्रचार इतना प्रबल होता है की लोग उन चीजों का भी समर्थन करते हैं जो उनके खिलाफ होती हैं।
                       हमारे देश में भी इसी तरह का जाल फैलाया गया है। जिसका असर ये हुआ है की पढ़े लिखे लोगों में से भी बहुत से लोग उन चीजों का समर्थन करते हैं जो उनके खिलाफ हैं। और अगर कोई संस्था या व्यक्ति उनके हित में बात भी करता है तो सबसे ज्यादा विरोध यही लोग करते हैं। यही चीज है जिसके कारण ये जनविरोधी व्यवस्था टिकी हुई है। लोगों को उनके हितों के खिलाफ ही लामबंद कर लिया जाता है। इसलिए ये जरूरी हो गया है की लोगों तक सही जानकारी पहुंचे।
                         हर एक देश में दो तरह के टैक्स होते हैं जिन्हे इकोनोमिक्स की भाषा में प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष कर कहते हैं। इसे आसान भाषा में सीधा कर और आड़ा कर कहा  जा सकता है। सीधा कर वह होता है जो सीधे कर के नाम से लिया जाता है जैसे इन्कम टैक्स और धन टैक्स (Wealth tax ) . और आड़ा कर वो होता है जो चीजों की कीमत में जुड़कर इकट्ठा होता है जैसे वैट या सेल्स टैक्स, एक्साइज ड्यूटी इत्यादि। ये जो कर चीजों की कीमत में जोड़कर लिया जाता है इसका प्रभाव हर आदमी पर होता है। जो भी आदमी कोई भी चीज खरीदता है उससे ये टैक्स ले लिया जाता है भले ही वह कितना ही गरीब क्यों ना हो। इसलिए जितना ये कर ज्यादा होता है उतना ही गरीबों को नुकशान होता है। अगर इस टैक्स की दर ज्यादा होती है तो उसका बोझ आम आदमी पर पड़ता है।
                          लेकिन जो सीधा कर होता है वो उन लोगों से इकट्ठा किया जाता है जो एक सीमा से ज्यादा पैसा कमा रहे होते हैं। इसमें भी टैक्स की दरें इस तरह रखी जाती हैं की कम कमाई वाले आदमी पर इसका बोझ कम पड़े और ज्यादा कमाने वाले पर ज्यादा बोझ पड़े। लेकिन हमारे देश में अगर ऊपर की ज्यादा कमाई वाले लोगों पर टैक्स की दर बढ़ाने की मांग की जाती है तो वो लोग ही इसका सबसे ज्यादा विरोध करते हैं जिनको ये टैक्स देना ही नही है। इसलिए अरबों रूपये कमाने वालों को समर्थन करने के लिए बैठे बिठाए लोग मिल जाते हैं। इसलिए इस सवाल को जरा ध्यान से समझने की जरूरत है।
                           सरकार अभी आड़ा टैक्स की प्रणाली को बदलने के लिए GST बिल लेकर आ रही है। इसमें जो सुझाव है उसके अनुसार इसकी दर 22 से 27 % के बीच रहने वाली है। इसका मतलब ये है की आम आदमी जो भी सामान या सेवा (जैसे बिजली या टेलीफोन इत्यादि का बिल ) खरीदेगा उसे कुल कीमत का एक चौथाई पैसा केवल टैक्स के रूप में देना पड़ेगा। यानि एक गरीब आदमी जो 6000 रूपये महीने में घर चलाता है उसे भी पिछले दरवाजे से हर महीने 1500 रूपये टैक्स के रूप में देने पड़ेंगे। ये टैक्स सामान की कीमत में ही जुड़ा होता है इसलिए आम आदमी को तो इसका मालूम ही नही पड़ता। परन्तु इतना भारी टैक्स होने के बावजूद देश में इसके खिलाफ कोई बोल ही नही रहा है। सरकार और मीडिया ने मिलकर ऐसा माहौल बना दिया है जैसे ये टैक्स तो हमारी अर्थव्यवस्था के लिए बहुत ही जरूरी है और देश के हित में है।
                           दूसरी तरफ सीधा कर जो इनकम टैक्स के नाम से और धन कर के नाम से लिया जाता है उसमे धन कर को तो सरकार ने इस साल से खत्म कर दिया है। ये वो कर था जो बड़ी सम्पत्ति के स्वामियों से लिया जाता था और जिसे कभी भी सरकार ने ईमानदारी से इकट्ठा करने की कोशिश नही की। वरना अगर इसे ईमानदारी से इकट्ठा किया जाता तो इससे बहुत बड़ी रकम प्राप्त हो सकती थी और आम आदमी पर इसका कोई बोझ भी नही पड़ता। हमारे देश में एक नंबर की सम्पत्ति के जो आंकड़े मौजूद हैं उसके अनुसार हमारे देश में स्थाई सम्पत्ति एक करोड़ बाईस लाख सत्तर हजार करोड़ रूपये है। इसमें लोगों के बैंक में जमा पैसा, बीमा में जमा , शेयर और दूसरे फंड में जमा पैसा शामिल नही है। इसमें केवल सोना और रियल एस्टेट जैसी चीजे ही शामिल हैं। इसमें से 74 % सम्पत्ति के मालिक केवल ऊपर के 10 % लोग हैं। और उससे भी आगे ये की इसमें से 49 % सम्पत्ति के मालिक केवल 1 % लोग हैं। अगर उन 1 % लोगों की सम्पत्ति पर सालाना केवल 1 % टैक्स ही लिया जाये तो उसकी रकम सालाना 60000 करोड़ से ज्यादा बैठती है। और ये तो वो सम्पत्ति है जो एक नंबर की है और उसकी कीमत भी उन लोगों की ही बताई हुई है।  सरकार ने ये टैक्स कभी ईमानदारी से इकट्ठा नही किया और अब उसे समाप्त कर दिया।
                      अगला उदाहरण इनकम टैक्स का है। जब भी इनकम टैक्स की दर में ऊपर के स्तर पर बढ़ौतरी की मांग उठती है तो सबसे पहले इसका विरोध वो लोग करते हैं जिन्हे वो दर जिंदगी में कभी लागु नही होगी।
2011 -12 के आंकड़ों के अनुसार 5 लाख तक की कमाई वाले लोगों से कुल 15000 करोड़ रुपया इकट्ठा हुआ था और उनकी संख्या 28844000 थी। अगर इन लोगों को टैक्स की स्लैब में 50000 रूपये की छूट दे दी जाती है तो सरकार को कुल मिला कर  5000 करोड़ का भी नुकशान नही होगा। दूसरी तरफ 20 लाख से ऊपर की कमाई बताने वाले लोगों की संख्या केवल 4 लाख 6 हजार थी। अगर इन लोगों की स्लैब में 30 % से बढ़ाकर 40 % की स्लैब कर दी जाये तो सरकार को करीब 23000 करोड़ रुपया ज्यादा मिल सकता है। सारे फेरबदल से लाभ होने वाले लोगों की संख्या 3 करोड़ है और असर पड़ने वाले लोगों की संख्या केवल 4 लाख है और सरकार को करीब 18000 करोड़ का फायदा भी हो सकता है। ये 2012 के आंकड़े हैं और अब 2015 है। इसलिए अगर एक करोड़ सालाना से ज्यादा कमाई बताने वाले लोगों पर 40 % की स्लैब लागु कर दी जाये तो मुश्किल से एक लाख लोग इससे प्रभावित होंगे और सरकार की कमाई करीब 25000 करोड़ बढ़ जाएगी।
                          लेकिन सरकार इससे उल्टा कर रही है। उसने कॉर्पोरेट टैक्स की दर को 5 % घटा दिया, धन कर खत्म कर दिया और आम लोगों पर वैट बढ़ाने जा रही है। ये सारी व्यवस्था अमीरों को और अमीर बनाने और गरीबों को गरीब बनाने के हिसाब से चल रही है। और ना केवल चल रही है बल्कि देश के मध्यम वर्ग का समर्थन भी प्राप्त कर रही है।रिजर्व बैंक द्वारा जारी किये गए 2012 -13  के अनुसार हमारे देश में कुल टैक्स उगाही में सीधे करों का हिस्सा 38 . 44 % है और आड़ा करों का हिस्सा 61 . 56 % है। गरीबी  और अमीरी का अंतर कम करने के लिए इस अनुपात को उल्टा करना जरूरी है। इसलिए इससे जो मुख्य बातें निकल कर आती हैं वो इस प्रकार हैं। ---
१.   इन्कम टैक्स की दर को एक करोड़ से ऊपर कमाई वाले लोगों के लिए 40 % किया जाये।
२.  कॉर्पोरेट टैक्स को घटाना बंद किया जाये।
३.  जीवन जरूरत की चीजों पर वैट हटाया जाये।
४.  धन कर को दुबारा और प्रभावशाली तरीके से लागु किया जाये और इसकी दर सालाना 1 % रखी जाये।

Saturday, September 5, 2015

भारत, चीन और अमेरिका में सम्पत्ति के बंटवारे की तुलना

भारत, चीन और अमेरिका ये तीन देश आर्थिक मामलों में हमेशा एक दूसरे की तुलना में उदाहरण के तौर पर पेश किये जाते रहे हैं। यहां भारत में जब भी किसी आर्थिक गतिविधि पर चर्चा होती है तो उसकी तुलना या तो चीन से की जाती है या अमेरिका से। हम आर्थिक स्थिति के अनुसार तो अमेरिका के आसपास नही हैं लेकिन दोनों की तुलना इसलिए की जाती है की दोनों विश्व के बड़े लोकतंत्र हैं और दोनों ने विकास का पूंजीवादी तरीका अपनाया है। चीन से हमारी तुलना इसलिए की जाती है, क्योंकि दोनों जनसंख्या के हिसाब से दुनिया के सबसे बड़े देश है, दोनों एशियाई देश हैं, दोनों विकासशील देश हैं और दोनों ने विकास के अलग अलग रास्ते अपनाये हैं। उदारीकरण के दौर के बाद जब चीन ने अपनी व्यवस्था को दुनिया के लिए खोला और कुछ बदलाव किये जो बाजार के अनुकूल हैं तो बहुत से विशेषज्ञों ने उदारीकरण की कुछ बुरी प्रवृतियों और उनके  नकारात्मक प्रभाव को तूल ना देने की बात करते हुए चीन के उदाहरण दिए। उन्होंने ये साबित करना चाहा, खासकर भारत के संदर्भ में की उदारीकरण के दुष्प्रभाव एकदम सामान्य किस्म के हैं और उनको एक समय के बाद खत्म किया जा सकता है। 
                          उन्होंने ये बताया की उदारीकरण के कारण अमीर और गरीब के बीच बढ़ती हुई खाई एक सामान्य बात है और उदारीकरण से जो फायदा गरीबों को होगा उससे इसके  दुष्प्रभाव कम हो जायेंगे। साथ ही उन्होंने ऐसा आभास भी दिलाने की भरपूर कोशिश की जैसे आय और सम्पत्ति का ये असमान बंटवारा एक सामान्य और ना रोकी जा सकने वाली प्रकिर्या है। लेकिन पिछले 15 सालों के आंकड़ों का अध्ययन किया जाये तो तस्वीर एकदम अलग नजर आती है। 
भारत में सम्पत्ति का बंटवारा -----
                                                  भारत के आंकड़े देखें जाएँ तो ये पता चलता है की सबसे अमीर 10 % लोगों का देश की कुल सम्पत्ति में हिस्सा सन 2000 में 65 . 90 %  था जो 2014 तक आते आते 74 % गया। जो इस बढ़ती हुई खाई को साफ तौर पर दिखाता है। साथ ही ये खाई इतनी चौड़ी और गहरी है की ये ऊपर  के 10 % लोग बाकि लोगों से इतने आगे हैं की अगर दूसरे 10 % यानि 10 से 20 % वाले लोगों का सम्पत्ति में हिस्सा देखा जाये तो वो भी केवल 9 . 4 % ही है। और देश के बाकि बचे कुल 90 % लोगों का देश की सम्पत्ति में हिस्सा केवल 26 % ही बैठता है। दूसरा आंकड़ा इससे भी भयावह है। इससे तो एकदम साफ हो जाता है की किस तरह उदारीकरण ने  अमीरों की सम्पत्ति में अनाप शनाप बढ़ौतरी की है और इस खाई को किस कदर चौड़ा किया है। ये आंकड़ा है देश के अति अमीर 1 % लोगों का। इन 1 % लोगों का देश की कुल सम्पत्ति में हिस्सा जो 2000 में 36 . 80 % था, 2014 में बढ़कर 49 % हो गया। यानि देश की आधी सम्पत्ति के मालिक केवल 1 % लोग हैं। 
                         अब इसकी एक दूसरी तुलना है जो पुरे विश्व की सम्पत्ति में और उसके हिसाब से दुनिया में गरीब, मध्यम और अमीर लोगों में हमारे देश की हिस्सेदारी पर है। पूरी दुनिया में जो सबसे गरीब 10 % लोग हैं उनमे भारतियों का हिस्सा 18 . 34 % है जबकि जो बीच के 50 से 60 % के लोग हैं उनमे हमारे केवल 12 . 5 % लोग हैं। जो सबसे ऊपर के 10 % लोग हैं उनमे भारतियों का हिस्सा केवल 1/2 % ही है। 
चीन का विश्व सम्पत्ति में हिस्सा -----------
                                                                चीन में हालत इससे बिलकुल उलटी है। वहां दुनिया के सबसे नीचे के 10 % लोगों में उसका कोई नागरिक नही है। जबकि बीच के 50 से 60 % के लोगों में चीनियों की संख्या    42 % है। और सबसे ऊपर के 10 % लोगों में उसका हिस्सा 6 . 8 % का है। उसके आंकड़े बताते हैं की उसमे मिडल क्लास के लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है और आय और सम्पत्ति का इतना असमान बंटवारा नही है। नीचे इसकी टेबल दी गयी है जिसमे भारत चीन और अमेरिका के तुलनात्मक आंकड़े दिए गए हैं। 
अमेरिका का विश्व सम्पत्ति में हिस्सा ----------
                                                                अमेरिका इस मायने में बहुत अमीर देश है। उस हिसाब से वहां अति गरीबों की संख्या तो नही ही होनी चाहिए जो की चीन में भी नही है। लेकिन ऐसा नही है। सबसे नीचे के 10 % लोगों में अमेरिकियों का हिस्सा 7 . 8 % है। क्या ये हैरानी की बात नही है। क्योंकि बीच के 50 से 60 % के लोगों में उसका हिस्सा केवल 2 % से भी कम है और ऊपर के 10 % लोगों में उसका हिस्सा 22 . 26 % है। इतनी अमीरी के बावजूद अमेरिका में गरीबों की बड़ी संख्या है। क्योंकि उसका विकास का रास्ता भेदभाव पर आधारित है। 
                              ये सभी आंकड़े THE HINDU के DATA सेक्शन से लिए गए हैं। इस टेबल से भारत, चीन और अमेरिका की तुलना को ठीक तरह से समझा जा सकता है।


                              INDIA                    CHINA               US
BOTTOM 10% 18.34 0 7.8
10-20% 32.31 3.49 0
20-30% 34.81 10.9 0
30-40% 30.17 8.94 0.97
40-50% 19.89 25.38 2.12
50-60% 12.49 42.04 1.72
60-70% 8.18 43.68 2.42
70-80% 5.14 43.14 4.02
80-90% 2.96 29.9 10.2
UPPER 10% 0.5 6.79 22.26