Saturday, May 28, 2016

भारत की जीडीपी ( GDP ) ग्रोथ के आंकड़े विश्वसनीय क्यों नहीं हैं ?

                जब से सरकार ने जीडीपी को मापने का तरीका बदला है तब से भारत की जीडीपी में एकदम उछाल आ गया है। सरकार तब से तेजी से विकास की रट लगाए हुए है और दावा कर रही है की भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेजी से विकास करने वाली अर्थव्यवस्था है। और जाहिर है की इसका श्रेय नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों को  दिया जा रहा है। लेकिन दुनिया का कोई भी जाना माना अर्थशास्त्री इसे स्वीकार नहीं कर रहा है। पूरी दुनिया की रेटिंग एजेंसियां, अर्थशास्त्री और निवेशक भारत सरकार द्वारा जारी किये गए आंकड़ों पर भरोसा नहीं कर रहे हैं।  यहां तक की अर्थशास्त्री और रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन भी इस पर सवाल उठा चुके हैं। सबका मानना है की जीडीपी के आंकड़े जमीनी हकीकत से  मेल नहीं खाते। इसको  दूसरे तरिके से समझें तो बात कुछ ऐसी है।
                मान लो आपका कोई जान पहचान वाला ये दावा करें की उसकी आय में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। और आप देखते हैं की उसने कार की जगह स्कूटर का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है, बच्चों को महंगे स्कुल से उठाकर सस्ते स्कूल में दाखिल कर दिया है , पूरे साल में उसने नए कपड़े नहीं बनवाए हैं  खर्चा चलाने के लिए बैंक से पैसा निकाला है तो आप उसके दावे पर कैसे भरोसा करोगे। वही हालत हमारी सरकार की है। उसके द्वारा उठाये गए कदम और जीडीपी से संबंधित दूसरे आंकड़े सरकार की जीडीपी ग्रोथ के आंकड़ों से मेल नहीं खाते।
               पिछला बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री ने शिक्षा और स्वास्थ्य के बजट में भारी कटौतियां की हैं। इसके साथ ही दूसरी सामाजिक योजनाओं में भी जैसे मनरेगा हो या बच्चों के मिड डे मील का बजट हो, उनमे भी भारी कमी की गई है। अगर सरकार की हालत अच्छी है तो इन मदो में इजाफा होना चाहिए था। इसके अलावा जो दूसरे इंडेक्स हैं वो भी जीडीपी के आंकड़ों से मेल नहीं खाते।
                सरकार ने 2015 -16 के लिए जीडीपी की वृद्धि दर 7. 6 % घोषित की थी जिसे अब घटाकर 7. 5 % कर दिया गया है। पिछले तरीके के हिसाब से ये वृद्धि दर करीब 5. 5 % बैठती है। दोनों तरीकों में करीब 2 % का फर्क है। अर्थशास्त्रियों का मानना है की तरीका भले ही जो हो, वृद्धि दर तो समान ही आनी चाहिए। इसकी विवेचना करते हुए वो दूसरे आंकड़ों पर नजर डालते हैं। जीडीपी में कई चीजें शामिल होती हैं जैसे औद्योगिक उत्पादन, कृषि उत्पादन, सेवा क्षेत्र और अन्य चीजें। साथ ही जब जीडीपी दर बढ़ती है तो उससे रोजगार में बढ़ोतरी होती है, बचत की दर बढ़ती है और निवेश की मांग में बढ़ोतरी होती है। लेकिन उनके आंकड़े भी कुछ और ही कहानी कहते हैं। जैसे - 2015 -16 की औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर केवल 2.4 % रही है।
            कृषि विकास दर --
                                      2015 -16 के लिए कृषि विकास दर भी केवल 1. 1 % ही रही है जो 2013 -14 में 4.2 %
और 2014 -15 में -0. 2 % थी।
            निर्यात वृद्धि दर --
                                       2013 -14 के दौरान निर्यात वृद्धि दर 4. 7 % थी जो 2014 -15 के दौरान घटकर -1.3 % रह गई थी जो और घटकर 2015 -16 में -17. 6 % रह गई। जो पूरा साल के दौरान हर महीने घटकर रिकार्ड हुई है।
            पूंजी निर्माण (बचत दर ) --
                                                    भारत में बचत की दरें हमेशा बाकी दुनिया के मुकाबले ज्यादा ही रहती है। लेकिन वो भी लगातार घटते हुए 2013 -14 में 31 . 6 % और 2014 -15 में 30 . 8 % और 2015 -16 में 29. 4 % रह गई। लेकिन इसके साथ ही बैंकों से कर्ज की मांग की  वृद्धि दर भी 2013 -14 के 13 . 9 % से घटकर 2015 -16 में केवल 11. 3 % रह गई।
                      इस तरह मौजूदा जीडीपी को मापने के तरीके  को लेकर लोगों में भारी संदेह है। सबसे बड़ी बात ये है की जीडीपी के आंकड़े केवल सरकार की वाहवाही के लिए नहीं होते बल्कि उनके हिसाब से योजनाएं बनाने के लिए होते हैं। अगर आंकड़े ही गलत हैं तो सही योजनाएं कैसे बनेंगी।
 

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